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अचानक केंद्र में आये पिछड़े वर्ग के मतदाता, केशव मौर्य ऐसे हुए बेहद महत्वपूर्ण

  • मौर्या और उनके साथियों के जाने के बाद भाजपा में चिंता की लकीरें
  • बाबूसिंह कुशवाहा सहित अन्य पिछड़े नेताओं पर फोकस
  • सपा के पिछड़ों, अति पिछड़ों पर ध्यान ने बदला चुनावी परिदृश्य

लखनऊ। कुछ दिन पूर्व तक सवर्ण खासकर ब्राह्मण वोटों के आसपास सिमट कर चलने वाला उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव अचानक पिछड़े और अति पिछड़ों के समर्थन की केंद्रीय भूमिका में आ गया है। ऐसा बदलाव भाजपा के मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य और उनके अनुयायियों द्वारा मंत्री पद और भाजपा छोड़ने के बाद हुआ है। ऐसा नहीं है कि इसके पहले तक भाजपा पिछड़ों और अति पिछड़ों के साथ दलितों पर ध्यान दे जरुर रही थी लेकिन फोकस ब्राह्मण समुदाय पर था। अब चुनावी परिदृश्य बदल गया है, समीकरण साधते की कोशिशें तेज हो गयी हैं।

babu singh kushwaha

मौर्य के पार्टी छोड़ समाजवादी पार्टी का दामन थामने के बाद भाजपा से इस वर्ग से ताल्लुक रखने वाले नेताओं में भाजपा छोड़ने की प्रतियोगिता सी चल रही है। इसके चलते पार्टी के अंदर पिछड़ों के सबसे बड़े चेहरे केशव मौर्य अहम हो गये हैं बल्कि एक समय भाजपा जिन बाबूसिंह कुशवाहा के नाम से बिदकती थी, उन्हीं बाबूसिंह कुशवाहा से पार्टी नेता न सिर्फ नजदीकी बढ़ाने को आतुर हैं बल्कि संभावना बलवती हो गई है कि भाजपा का उनसे चुनावी गठबंधन हो सकता है। ऐसा होता है तो लम्बे समय से राजनीतिक दलों के लिए भ्रष्टाचार के प्रकरणों के चलते अछूत चल रहे बाबूसिंह के दिन बदल सकते हैं। भाजपा ने शनिवार को जो अपनी 105 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की है उसमें सर्वाधिक 44 नाम पिछड़ों के ही हैं।

keshav maurya

यह बताने के लिए पर्याप्त है कि उत्तर प्रदेश की लड़ाई अब पिछड़ों के वोट पर सिमट गई है। 2014 के लोकसभा चुनाव, 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी पिछड़ों और अति पिछड़ों का समर्थन बीजेपी के लिए संजीवनी साबित हुआ था। लेकिन इस बार ताजा घटनाक्रमों के बाद भाजपा आलाकमान को लग रहा है कि विपक्ष, विशेषकर समाजवादी पार्टी अति पिछड़ा वोट अपने पाले में खींच सकती है, तो चिंता स्वाभाविक है।

इसमें अब कोई शक नहीं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में अति पिछड़ा वर्ग ही निर्णायक साबित होगा। कोरोना महामारी ने आम लोगों के सामने गंभीर संकट पैदा किया। इस दौरान बहुत से लोगों का रोजगार गया। बड़ी संख्या में पलायन हुआ। किसान आंदोलन हुआ। आवारा पशु किसानों के सामने संकट बने रहे। विपक्ष का मानना है कि इन सब वजहों से लोग योगी सरकार से नाराज हैं और इस चुनाव में प्रधानमंत्री द्वारा योगी के पक्ष में शुरू किया गया चुनावी अभियान भी बीजेपी को बचा नहीं पाएगा। समाजवादी पार्टी पहले से ही अति पिछड़ों के बीच लोकप्रिय रही है, लेकिन 2014 में अति पिछड़ा मतदाता नरेंद्र मोदी के साथ ऐसा जुड़ा कि चुनाव-दर-चुनाव उन्हीं के लिए वोट करता रहा।

विपक्षी दलों को लगता है कि इस बार सत्ता विरोधी रुझान का असर पड़ा है और अति पिछड़े वर्ग के लोग भी योगी सरकार को हराने में लग सकते हैं। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव वे सारे प्रयास कर रहे हैं, जिससे अति पिछड़े वोट को अपनी झोली में डाल सकें। पिछले 2 वर्षों में लोगों की परेशानियां बढ़ी हैं और अति पिछड़े वर्ग में समाजवादी ने सेंधमारी की है।

केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चलाई गई तमाम योजनाओं का लाभ वैसे तो पूरे समाज को हुआ है लेकिन यहां भी सर्वाधिक लाभ अति पिछड़ों और दलितों को हुआ है और इसका असर भी दिख रहा है। पिछड़े वर्ग के एक नेता की मानें तो योगी सरकार ने जो पिछड़ों और अति पिछड़ों की जो मदद की है, कोई कर नहीं सकता। इसलिए वह फिर से एक बार इसी सरकार को लाना चाहते हैं।

यह भी सचाई है कि भाजपा ने मतदाताओं का एक ऐसा वर्ग तैयार कर दिया है, जो ज्यादा बोलता नहीं है लेकिन वोट देता है। कमोबेश इसी तरह का मतदाता पहले बहुजन समाज पार्टी के पास हुआ करता था। उसी की बदौलत वह चुनाव परिणाम आने पर राजनीतिक विश्लेषकों को आश्चर्य में डाल देती थी। बहरहाल, जमीनी हकीकत की पड़ताल करने के बाद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि समाजवादी पार्टी अति पिछड़े वोटों को अपनी ओर करने का भरपूर प्रयास कर रही है और इसमें कुछ हद तक सफल भी हुई है, लेकिन कोई बहुत बड़ी सेंध अब तक नहीं लगा पाई है। बीजेपी का कुछ वोट कटा है, लेकिन केंद्र और राज्य की लोकलुभावन योजनाओं ने बहुत गहरा असर छोड़ा है और बहुत से ऐसे मतदाता बीजेपी के साथ जुड़ गए हैं, जो पहले विपक्षी दलों से जुड़े हुए थे। समाजवादी पार्टी इस वर्ग पर गहरी नजर जमाए हुए है। अति पिछड़े वोटों के लिए राजनीतिक दाव-पेच तीखे होते जा रहे हैं। विपक्षी दलों के लिए यह लड़ाई आसान नहीं है। ऐसे में राजनीतिक रुप से हाशिए पर पड़े थोड़ा भी जनाधार रखने वाले पिछड़ा वर्ग के नेताओं की तलाश हो रही है जो मौर्या और उनके साथियों के जाने के बाद भाजपा में आए खालीपन को भर दे।

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राजनीतिक विश्लेषक, वरिष्ठ पत्रकार हरिमोहन विश्वकर्मा की रिपोर्ट