यूपी के बुंदेलखंड की बेमिसाल परंपरा, यहां 837 साल से रक्षाबंधन पर राखी नहीं बांधती बहनें

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यूपी। पौराणिक शास्त्रों में ही रक्षा बंधन के त्यौहार को मनाया जाता रहा है। और यह परंपरा अब तक चल रही है। जिसके चलते हर बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं। लेकिन एक जगह ऐसी है, जहां पर इस त्यौहार को नहीं मनाया जाता। वो देश कही विदेश नहीं बल्कि भारत का ही देश है। खास बात तो यह है कि यहां पर करीब 837 साल से बहनों ने अपने भाईयों की कलाईयों पर राखी बांधी ही नहीं हैं। इसकी मुख्य वजह परंपरा है। जिसके चलते इस ऐसा किया जाता है। इसे भी पढ़ें: जिम सूट पहने मलाइका अरोड़ा का Video हुआ वायरल, लोगों ने किया ट्रोल

इस वजह से नहीं बांधती राखी
बता दें कि भारत के एक छोटे से शहर बुंदेलखेंड में 837 साल पूर्व उरई के शासक माहिल के कहने पर महोबा के राजा परमालिदेव ने सेनापति आल्हा और ऊदल को राज्य से निकाल दिया था। और कुछ दिन बाद रक्षाबंधन पर राजकुमारी चंद्रावल अपनी सहेलियों के साथ कीरतसागर तालाब में कजलियां बहाने जा रही थी। और रास्ते में दिल्ली के राजकुमार पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी चंद्रावल का घेर लिया। जिसके बाद पृथ्वीराज चौहान ने राजा परमालि से युद्ध रोकने के लिए बेटी चंद्रावल, पारस पथरी व नौलखा हार सौंपने की शर्त रखी। जिसके चलते चंदेल शासक ने इसे ठुकरा दिया। जिसके बाद बहुत बड़ा युद्ध हुआ। जिसमें सभी महिलाओं ने भी युद्ध में हिस्सा लिया था।

इतिहासकारों ने इसे भुजरियों के युद्ध की संज्ञा दी है। इसमें राजकुमारी चंद्रावल ने सखियों के साथ तलवार लेकर बहादुरी से चौहान सेना का मुकाबला किया। युद्ध में जीत मिली, लेकिन कजलियों का विसर्जन दूसरे दिन हो सका। इसी दिन रक्षापर्व दूसरे दिन मनाने की परंपरा शुरू हुई जो आज भी गर्व का अहसास कराती है।

गांव छिकहरा के लोग आल्टा सम्राट वंशगोपाल यादव का बताते हैं कि आल्हा ऊदल महोबा से जा चुके थे, लेकिन जब उन्हें चौहान सेना के साथ युद्ध की जानकारी मिली तो साधु वेश में महोबा लौटे और चौहान सेना के साथ युद्ध किया। इससे चौहान सेना के पैर उखड़ गए और उन्हें मात खानी पड़ी। इसे भी पढ़ें: यूपी की पीली साड़ी वाली लड़की, अब नीली साड़ी में हो रही है वायरल..ये वीडियो देखिए

युद्ध में मिली विजय के चलते तब से शुरु हुई ये परंपरा
आपको बता दें बुंदेलखंड के लोग इस परंपरा को बहुत सालों से निभा रहे हैं और उनकी नजर में वो अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि भुजरियों के युद्ध में मिली विजय के उत्सव के रूप में दूसरे दिन ही कजली महोत्सव होता है और इसी दिन कजलियों का विसर्जन किया जाता है।

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