Saturday, December 4, 2021

पीएम के संसदीय क्षेत्र में नमामि गंगे भी अब ‘राम तेरी गंगा मैली’ हो गयी

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  • जिला प्रशासन को सौंपी गई जांच रिपोर्ट
  • शैवाल के जमे होने पर हुआ था गंगा के पानी का जांच
  • जांच में नाइट्रोजन और फास्फोरस मानक से अधिक पाया गया
  • जलीय जंतु के लिए भी खतरनाक स्थित

वाराणसी। प्रधानमंत्री मोदी ने जब वाराणसी लोकसभा चुनाव का उद्घोष किया था तो उन्होंने कहा था कि ‘मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है’। जन्म जन्मांतर का पाप धूलने वाली गंगाजल अब आचमन करने योग्य भी नहीं रह गया है। मरणासन्न व्यक्ति के मुंह आखिरी बूंद गंगाजल डाला जाता है जो अपनी महत्ता खो चुका है। गंगा की नयी गंदगी का मामला गंगा के शैवाल का है जो हालत को और गंभीर बना दिया है। शैवाल के कारण जल में बढ़े हुए नाइट्रोजन और फास्फोरस के कारण अब गंगा पानी में ऑक्सीजन के लेबल में खासा असर पड़ा है। ऑक्सीजन लेबल के कारण जलीय जंतु के लिए खतरनाक तो है ही साथ ही जनमानस के लिए भी संकट बढ़ गया है। इसका खुलासा एक जांच कमेटी ने किया है जिसकी जांच रिपोर्ट शासन को सौपा गया है।

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पुराने एसटीपी के कारण बन रहा शैवाल
गंगा निर्मलीकरण की सभी योजनाएं नमामि गंगे की तहर फेल होती गयी। इन दिनों गंगा जल का रंग हरे रंग में तब्दील हो चुका है। यह हालत लगातार 20 दिनों से बना हुआ है। गंगा के पानी का रंग हरा होने का मामला गर्माया तो जिलाधिकारी ने जांच कमेटी गाठित की। कमेटी में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी शामिल किया गया। जांच कमेटी ने गंगा के पानी का सैम्पल लेकर जांच किया जिसकी रिपोर्ट शासन को सौप दिया गया है । रिपोर्ट में बताया गया है कि गंगा का पानी मिर्जापुर में गंगा के किनारे यानी अप स्टीम में बने एक पुराने एसटीपी के कारण हरा हुआ है जिसके कारण शैवाल बन रहा है।

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स्नान और आचमन नहीं करने की अपील
रिपोर्ट इस बात का भी खुलासा करता है कि गंगा के पानी में नाइट्रोजन और फास्फोरस मानक से अधिक है जो ऑक्सीजन लेबल को काफी कम कर देता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी ने अभी बनारस की जनता से यह अपील की है कि अभी चार पांच दिनों तक गंगा में स्नान या फिर आचमन नहीं करें ।
काषी हिन्दू विश्वविद्यालय के के इंस्टीट्यट ऑफ इंवॉइरमेंटल स्टडीज के प्रोफेसर कृपा राम मानते है कि इस समय आचमन और गंगा स्नान से बचने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि गंगा के ऊपर बना यह शैवाल सूर्य के रेडिएशन के खिलाफ एक कवच का काम करता है। इसकी वजह से नदी के जल में बीओडी की कॉनसन्ट्रेशन कम होने लगती है और लम्बे समय तक अगर ये स्थिति अगर बनी रहती है तो निश्चित तौर पर जलीय जीवों को इससे नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि पानी मे नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की बढ़ी मात्रा की वजह से कम से कम फिलहाल आचमन और स्नान करने से परहेज ही बेहतर विकल्प है।

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