उत्तर प्रदेश को बांटने के लिए की जा रही आंदोलन की प्लानिंग, जानिए कितने भागों में बंटेगा UP

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उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) भारत का सबसे बड़ा राज्य (India’s biggest state) है जिसकी आबादी 22 करोड़ है। इसके एक छोर से दूसरे छोर के बीच की दूरी करीब 11 सौ किलोमीटर है। उत्तर प्रदेश इससे भी बड़ा राज्य था लेकिन साल 2000 में इसके एक हिस्से को अलग करके उत्तराखंड (Uttarakhand) बना दिया गया। अब एक बार फिर से उत्तर प्रदेश को बांटने की प्लानिंग चल रही है। यूपी को तीन से चार भागों में बांटने (Division of Uttar Pradesh) के लिए नए सिरे से आंदोलन चलाने की योजना बनाई जा रही है, जिसकी शुरुआत पश्चिमी यूपी से होगी। इस आंदोलन में सभी धर्मों और जातियों को जगह दी गई है।

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यूपी बंटवारे की उठी मांग
कहा तो ये भी जा रहा है कि इस आंदोलन में उन लोगों को जगह दी जाएगी जो मेरठ में हाईकोर्ट की बेंच बनाने की मांग उठाते रहते हैं। उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी होने के चलते इसका बंटवारा किया जाने की आवश्यकता बताई जा रही है। राज्य के विकास योजनाओं को गति देने और आम जनता की सहूलियत के लिए यूपी को बांटा जा रहा है। बता दें कि, बीते मानसून सत्र में यूपी के बंटवारे के मामले को लोकसभा में भी उठाया जा चुका है। यूपी को तीन राज्यों-हरित प्रदेश (Harit Pradesh), बुंदेलखंड (Bundelkhand) और पूर्वांचल (Purvanchal) के रूप में बांटने को काफी समय से आवाज उठाई जा रही है।

मायावती ने उठाई मांग
यूपी को तीन भागों में बांटने के लिए अब शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह आवाज उठा रहे हैं जिनमें वह पश्चिमी यूपी को तरजीह दे रहे हैं जिसके लिए वह आवाज उठा रहे हैं। इसमें एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री के खास आदमी भी शामिल हैं। इससे पहले बहुजन समाज पार्टी (BSP) और यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती (Mayawati) ने आवाज उठाई थी और सिर्फ आवाज ही नहीं बल्कि जल्दबाजी में 21 नवंबर 2011 को विधानसभा में बिना चर्चा यह प्रस्ताव पारित करवा दिया था।

सपा के आने से हुई ढीली
हालांकि, 2012 में यूपी के विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखने पर मायावती की ये रणनीति खराब हो गई। मायावती यूपी को चार राज्यों-अवध प्रदेश, बुंदेलखंड, पूर्वांचल और पश्चिम प्रदेश (West UP) में बांटना चाहती थी। बता दें कि मायावती खुद पश्चिमी यूपी से ताल्लुक रखती है। हालांकि, मायावती की ये चाह 2012 में बसपा सरकार के बनने की वजह से फीकी पड़ गई। अब कोरोना महामारी के बीच संसद के मानसून सत्र में बिजनौर से बसपा सांसद मलूक नागर ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने का मुद्दा उठाया था।

पुराना है मुद्दा
यूपी के बंटवारे में सबसे पहला नाम नब्बे के दशक में हरित प्रदेश का था जिसकी मांग कांग्रेस नेता निर्भय पाल शर्मा व इम्तियाज खां ने उठाई थी। हरित प्रदेश में आगरा, मथुरा, मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद तथा बरेली मंडलों को मिलाकर प्रदेश बनाने की मांग की गई थी। पूर्वांचल राज्य की मांग उत्तराखंड से भी पुरानी है। इसे 1962 में गाजीपुर से सांसद विश्वनाथ प्रसाद गहमरी ने लोकसभा में उठाया था जिसके साथ उन्होंने क्षेत्र की समस्या को भी दर्शाया था, जिस पर नेहरू भावुक हो गए थे। वहीं करीब दो दशकों से बुंदेलखंड के लिए आवाज उठाई जा रही है।

केंद्र सरकार लेगी निर्णय
राज्यों के बंटवारे की मांग सदियों से लोग करते आ रहे हैं, लेकिन लोकसभा में पहुंचते पहुंचते ये ठंडा पड़ जाता है। राज्यों के बंटवारे का निर्णय केंद्र सरकार के हाथ में होता है। संविधान के अनुच्छेद 3 में इसका उल्लेख भी है। अनुच्छेद 3 के तहत केंद्र सरकार को नए राज्यों के निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन का अधिकार दिया गया है।

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