माया ने मुलायम पर दिखाई दरियादिली, ‘गेस्ट हाउस कांड’ केस को वापस लेने के लिए दाखिल की अर्जी

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सियासत और सियासी नुमाइंदों इन दोनों के चरित्र और गतिविधियों का पूर्वानुमान लगाना किसी भी सियासी पंडित के लिए कोई आसान काम नहीं है, जिस प्रकार किसी-भी व्यपार का मुख्य उद्देशय अधिक से अधिक लाभ कमाना होता है…ठीक उसी प्रकार प्रत्येक सियासी दलों के नुमाइंदों का मुख्य ध्येय सत्ता सुख की प्राप्ती करना होता है और उसके लिए ये नुमाइंदे बेवक्त व हर परिस्थिति के साथ समझौता करने में कोई गुरेज नहीं करते। ये भी पढ़े :बीजेपी नेता की मायावती पर आपत्तिजनक टिप्पणी; बिजली के नंगे तार जैसी हैं

अब इसी बीच, उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी सियासी सूरमाओं वाली छवि विकसित करने वाले सपा और बसपा को ही देख लीजिए। कभी इनके अदावत के किस्से राजनीतिक विज्ञान की इबारतों में मुख्य किरदार की भूमिका में नजर आते थे, लेकिन जब बात इन दोनों के सियासी हितों की आई तो इन्होंने इस अदावत को ताक पर रखने में कोई गुरेज नहीं किया।

हालांकि, हम इसकी एक बानगी गत लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा के गठबंधन के रूप में देख चुके हैं। जब इन्होंने अपनी अर्सों पुरानी सियासी अदावत को ताक पर रखकर गठबंधन की नौका में सवार होकर आम चुनाव में सियासी दुर्ग फतह करने का मन बनाया था। अब वो अलग विषय है कि इनकी ये मंशा धरातल पर उतरने में नाकाम साबित हुई।

अब इसी बीच, इसी सन्दर्भ में जो खबर सामने आई है। वो भी सियासी जमातों के लिए कमोबेश ही नहीं अपितू पूर्णत: हैरान करने वाली है। खबर के मुताबिक, बसपा प्रमुख मायावती ने सर्वोच्च न्ययालय में अर्जी दाखिल कर 1995 के गेस्ट हाउस कांड में सपा के पूर्व अध्यक्ष व उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का नाम वापस लेने की अर्जी दाखिल की है। फिलहाल, ये खबर सियासी पंडितों सहित हर तबकों के पत्रकारों के मध्य चर्चा का विषय बनी हुई है।

हालांकि, इसमें कोई हैरानी वाली बात नहीं है। यहां हम आपको वो बात बताते चले, जो आपसी हित के कारण मीडिया में इन दलों ने लीक करना गवारा नहीं समझा, लेकिन हां…इसकी सुगबुगाहट तभी से प्रखर हो गई थी, जब इन दोनों दलों ने अर्सों पुरानी अपनी अदावत को भुलाकर गठबंधन की नौका पर सवार होने का फैसला किया था।

दरअसल, अखिलेश यादव ने इस सिलसिले में मायावती से पूर्व में ही मंत्रणा कर ली थी कि गेस्ट हाउस कांड प्रकरण में से मुलायम सिंह का नाम वापस ले लिया जाए, लेकिन आम चुनाव निकट होने के कारण और ऐन वक्त में गठबंधन के खुमार में मदहोश मायावती ने इस प्रस्ताव पर बिना किसी विमर्श के अमिट मुहर लगा दी थी, जो तब खूब सुर्खियां बटोरने में मसरूफ रही।

…तो चलिए अब ज्यादा समय न जाया करते सीधा इस ख़बर के मुख्य किरदार अर्थात गेस्ट हाउस कांड पर आ जाते हैं कि आखिर ये पूरा प्रकरण, जिसके किरदार की चर्चा प्रसंग के आगाज से लेकर अंजाम तक होती रही है। दरअसल, 1995 के गेस्ट हाउस की वस्तुस्थिति को समझने से पहले आपको उस दौर में जाना होगा, जब समाजवादी पार्टी से समर्थन वापस लेने के बाद सपा कार्यकर्ताओं ने गेस्ट हाउस पर मौजूद मायावती पर जानलेवा हमला किया था, इसलिए ये मामला गेस्ट हाउस कांड से विख्यात है।

तभी से शुरू होती है सूबे के दोनों ही दलों की अदावत के पटकथा की वो अविस्मरणीय कहानी, जिसका समापन हमें गत लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था, लेकिन इन दोनों ही दलों के लिए वो पल बड़ा अफसोसजनक रहा होगा, जब चुनाव में करारी शिकस्त के बाद बसपा ने सपा पर तोहमतोें की बौझार करते हुए इस सियासी मेल को ज़मीदोज़ कर दिया, जिसे लेकर बीजेपी ने सपा-बसपा पर आक्षेप भी लगाए थे।

हालांकि, बीजेपी सपा-बसपा के इस गठबंधन को लेकर शुरु से व्यंग करती रहती है। बीजेपी का हमेशा से यही कहना रहा कि आप देख लीजिएगा ये गठबंधन लोकसभा चुनाव तक की है। आम चुनाव के मुकम्मल होते ही ये गठबंधन गुमनामी की गलियों में हमेशा-हमेशा के लिए ज़मीदोज़ हो जाएगा। और हैरानी की तो बात ये रही कि बीजेपी का ये पूर्वानुमान बिल्कुल सत्य और सटीक साबित हुआ। ये भी पढ़े :सपा नेता पर इस महिला ने लगाए गंभीर आरोप, कहा- कपड़े भी फट गए थे 

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