• भाजपा से नहीं, सपा-बसपा की आपस में एक दूसरे से आगे दिखाने की लगी है होड़
  • ब्राह्मण वोट बैंक खींचने के चक्कर में कहीं अपना वोट बैंक न खो दें दोनों पार्टियां

उपेन्द्र राय
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के लिए जहां बहुजन समाज पार्टी ने ‘मंदिर व ब्राह्मण’ का दांव खेला है। वहीं समाजवादी पाटी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी ब्राह्मणों को लुभाने के लिए ब्राह्मण सम्मेलन करने का फैसला कर लिया है। समाजवादी पार्टी बलिया से ब्राह्मण सम्मेलन शुरूआत करने जा रही है। भाजपा के साथ शिफ्ट हो चुके ब्राह्मणों को लुभाने के लिए चली यह चाल कितनी सफल होगी, यह तो समय बताएगा, लेकिन राजनीतिक जानकारों की मानें तो ब्राह्मणों को लुभाने के चक्कर में इन दोनों पार्टियों का अपना वोट बैंक भी खराब होने का आशंका है। इन परिस्थितियों में ‘दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम।’ वाली कहावत चरितार्थ हो सकती है।

सपा और बसपा में ही आपसी प्रतिद्वंदिता
राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में फिलहाल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच आपसी प्रतिद्वंदिता ही दिख रही है। दोनों अभी भाजपा के खिलाफ न लड़कर आपस में ही लड़ने की चाल चल रहे हैं। इसका कारण है दोनों आमजन के बीच यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि हम भाजपा के मुख्य प्रतिद्वंदी हैं। यही कारण है कि जब ब्राह्मणों को लुभाने के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सत्ता में आने पर परशुराम की मूर्ति लगाने की घोषणा की तो मायावती ने बिना समय गवाएं समाजवादी पार्टी की अपेक्षा परशुराम की मूर्ति ज्यादा भव्य व बड़ी लगाने की घोषणा कर दी।

mayawati survey

श्रीराम के नारे के पीछे भी सियासत का खेल
अब बहुजन समाज पार्टी ने नहले पर दहला वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए बुद्धिजीवी सम्मेलन के नाम पर ब्राह्मण सम्मेलन करने का फैसला किया और अयोध्या से शुरूआत कर दी। इसके बाद अखिलेश यादव ने भी अपने ब्राह्मण नेताओं को बुलाया और उसके काट पर मंथन किया। इसके बाद उन्होंने भी पूरे यूपी में ब्राह्मण सम्मेलन करने का फैसला कर लिया। इसमें अंतर इतना है कि बसपा ने इसकी शुरूआत अयोध्या से शुरूआत की। वहां सतीश मिश्रा ने श्रीराम के नारे भी लगाये लेकिन अखिलेश यादव ने इससे परहेज किया। अखिलेश यादव इस बात का ख्याल कर रहे हैं कि किसी वर्ग को लुभाने में कहीं अल्पसंख्यक न नाराज हो जायं।

akhilesh yadav survey

राजनीतिक विश्लेषक हर्षवर्धन त्रिपाठी का कहना है कि पहले और अब में बहुत अंतर आ गया है। 2007 में भी भाजपा के आगे बढ़ते न देख ब्राह्मण बसपा पर चढ़ा था लेकिन अब भाजपा के साथ ब्राह्मण पूरी तरह शिफ्ट हो चुका है। ऐसे में सपा और बसपा को ब्राह्मणों को लुभाने के चक्कर में अपना बेस वोट बैंक भी गंवाना पड़ सकता है। यूपी की राजनीति में विशेष पकड़ रखने वाले राजीव रंजन सिंह बताते हैं कि उत्तर प्रदेष में अभी तक सपा और बसपा आपस में लड़ रही है। भाजपा इनसे आगे दिख रही है। इस चुनाव में जातिगत लाभ के लिए किसी विशेष वर्ग को लुभाने की कोशिश में इनका आधार वोट बैंक न खिसक जाय, इसका डर है।

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