Friday, December 3, 2021

अखिलेश और जयंत का जाटलैंड के लिए बना जीत का फाॅर्मुला, गठबंधन में ऐसी होगी भागीदारी

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी गठबंधन बनने लगे हैं। छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन कर सत्ता में वापसी करने जुटे समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाटलैंड में जीत का फॉर्मूला तय कर लिया है। मंगलवार को राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी के साथ उनकी दो घंटे लंबी मुलाकात में गठबंधन पर चर्चा हुई। ज्ञात हो कि पश्चिम यूपी में रालोद की भूमिका हमेशा से अहम रही है। किसान आंदोलन के साथ ही चौधरी अजीत सिंह की कोरोना से मौत की सहानुभूति भी जयंत चौधरी  के साथ होगी। सपा मुखिया अखिलेश और जयंत की जुगलबंदी से बीजेपी की मुश्किलें बढ़ेंगी। अभी गठबंधन में सीटों का औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है। सपा रालोद को जाटलैंड की 36 सीटें देगी और यह बताया जा रहा है कि उप मुख्यमंत्री के लिए भी बात हो रही है।

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जिस फॉर्मूले पर गठबंधन पर सहमति बनी है उसके मुताबिक रालोद 30 सीटों पर प्रत्याशी उतारेगी, जबकि 6 सीटों पर सपा के सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे। सपा और रालोद गठबंधन पर सभी की निगाहें हैं। किसान बिल वापसी के बाद सपा जयंत चौधरी को ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं हैं। सभी अटकलों को विराम देते हुए मंगलवार को जब जयंत और अखिलेश के बीच मुलाकात हुई तो गठबंधन की गांठ बंध ही गई। अब दोनों दलों सीटों को समझौता हो जाना है। ऐसा माना जा रहा है कि इस गठबंधन से जाट और मुस्लिम एक साथ होकर वोट करेंगे। पश्चिम यूपी की कई सीटों पर सियासी समीकरण बदल सकता है। अखिलेश यादव और जयंत के लिए यह बेहतर अवसर होगा।

छोटे-छोटे दलों से अखिलेश कर रहे गठबंधन

अखिलेश यादव पहले ही साफ कर चुके हैं कि वे 2022 के विधानसभा चुनाव में किसी भी बड़े दल से गठबंधन नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि बड़े दलों के साथ गठबंधन को अनुभव बुरा ही था। वे इस बार छोटे-छोटे दलों को संग लेकर चलेंगे। अभी तक अखिलेश यादव ने 12 छोटे दलों से गठबंधन किया है। इनमें केशव देव मौर्य के महान दल, डा. संजय सिंह चैहान की जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट), शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी।

जातीय समीकरण साधने की कोशिश

अखिलेश छोटे दलों से गठबंधन कर जातीय समीकरण साधने की कोशिश कर रहे हैं। जाति आधरित पार्टी को अपने साथ जोड़कर वे यादवों के अलावा अन्य पिछड़ों का वोट भी अपने पाले में लाना चाहता हैं। इससे पिछड़ा वर्ग और जाति के मतदाता भी एक साथ होंगे। हालांकि उनकी यह कोशिश कितनी सफल होगी यह 2022 का चुनाव परिणाम ही बताएगा।

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