Friday, December 3, 2021

अखिलेश की रथयात्रा और BJP की रैली से बना सीधा मुकाबला, सिमट गयी BSP-CONGRESS

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक सरगर्मी भी बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही यह पूरा चुनाव सिर्फ भाजपा और सपा के बीच सीधी टक्कर की ओर बढ़ रहा है। भाजपा पिछली बार के प्रदेश को दोहराती हुई तो नजर नहीं आती लेकिन अभी सत्ता से उससे दूर होता नहीं दिखता। इसका कारण है भाजपा की व्यूह रचना, जिसमें बार-बार अखिलेश यादव फंस जा रहे हैं। अब आगे क्या होगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन अभी तो यही अनुमान है कि भाजपा बनाम सपा तक ही यह चुनाव सिमट कर रह जाएगा। वहीं तीसरे और चौथे नम्बर के लिए बसपा और कांग्रेस के बीच घमासान होगा।
अभी पूरी भाजपा पूर्वांचल पर अपना पूरा दांव लगा रही है। उसकी कोशिश है कि इस बार वहां से सीटें निकाली जायं, जहां पर पिछली बार लहर के बावजूद जीत नहीं पाये थे। इसी अभियान के तहत केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का कार्यक्रम आजमगढ़ में रखा गया था, जहां मात्र एक सीट भाजपा पाई थी। बलिया में भी भाजपा बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पायी थी। पूर्वांचल में बनारस ही ऐसी जगह रही, जहां की सभी सीटें भाजपा की झोली में गयी थी।

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उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव दो दलीय होता जा रहा है। वर्तमान रथयात्रा और रैलियों से समाजवादी पार्टी सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी के बीस सीधी टक्कर की स्थिति बन गयी है। 2017 की तुलना में इस बार अखिलेश यादव बेहतर प्रदर्शन करेंगे। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की वाराणसी में आयोजित ‘मास्टरक्लास’ में शामिल हुए करीब तीन दर्जन नेताओं का मानना है कि 2017 का 325 सीटों वाला प्रदर्शन दोबारा शायद मुमकिन नहीं होगा। भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर के कारण नुकसान उठा सकती है लेकिन वह सत्ता नहीं गंवाएगी। इस बार का नुकसान हमें सत्ता से बाहर रखने के लिए काफी नहीं होगा। हम फिर भी आसानी से जीतेंगे। नरेंद्र मोदी-योगी आदित्यनाथ की दोहरी अपील के अलावा कमजोर और बंटा हुआ विपक्ष भी बड़ी संपत्ति है। सपा-कांग्रेस या सपा-बसपा गठबंधन बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती हो सकता था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बगैर विपक्षी गठबंधन के भी बसपा करीब 20 फीसदी वोट हासिल करेगी। कांग्रेस 5-10 प्रतिशत वोट हासिल कर सकती है और भाजपा को 40 फीसदी से ज्यादा वोट मिलेंगे।

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प्रियंका गांधी ने कहा है कि कांग्रेस यूपी चुनाव अकेले ही लड़ेगी। सपा और बसपा ने भी एक-दूसरे के साथ गठबंधन की संभावनाओं से इनकार किया है। चुनावी रणनीति में शामिल सपा नेता ने बताया कि प्रदेश में अब दो दलों के बीच सीधा मुकाबला है। मतदाता जानते हैं कि बसपा या कांग्रेस को वोट देने का मतलब नहीं है। भाजपा विरोधी ज्यादातर वोट सपा को मिलेंगे। यह ‘पिछड़ा बनाम अगड़ा’ का चुनाव है। यादवों और मुसलमानों के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग के वोट भी सपा को मिलेंगे। महंगाई, ईंधन की बढ़ी कीमतें, रसोई गैस और राशन की कीमतें भी जमीन पर सपा के अभियान को मजबूत बना रही हैं।

यदि चुनावी परिदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो प्रियंका गांधी ने कहा है कि कांग्रेस यूपी चुनाव अकेले ही लड़ेगी। सपा और बसपा ने भी एक-दूसरे के साथ गठबंधन की संभावनाओं से इनकार किया है। ऐसे में सबकी नजर या तो भाजपा के पक्ष में है या उसके विरोध करने वाले सपा के पक्ष में। यही कारण है कि अब धीरे-धीरे चुनावी ग्राफ साफ होता नजर आ रहा है। भाजपा इस चुनाव में बार-बार अखिलेश यादव को अपने पिच पर लाने के फिराक में है और वे कभी-कभार फंस भी जा रहे हैं। जैसे जिन्ना का मुद्दा उठाकर उन्होंने भाजपा को खेलने का मौका दे दिया।
राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन सिंह का कहना है कि प्रदेश में अब दो दलों के बीच सीधा मुकाबला है। मतदाता जानते हैं कि बसपा या कांग्रेस को वोट देने का मतलब नहीं है। भाजपा विरोधी ज्यादातर वोट सपा को मिलेंगे। यदि मुसलमानों का पुरा वोट बैंक सपा की ओर चला गया तो यहां गणित बदल भी सकती है, लेकिन अभी तक भाजपा ही नम्बर वन की पार्टी दिख रही है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी के मुखिया फिलहाल सही रास्ते पर चल रहे हैं लेकिन सिर्फ योगी को निशाना बनाने का मतलब है कि योगी की ओर सहानुभूति लहर जा सकती है। राजनीति में जब सभी मिलकर एक व्यक्ति पर निशाना साधने लगते हैं, तो जनता अमूमन उस निशाना बने व्यक्ति की ओर ही झुक जाती है।

अखिलेश यादव के लिए करो या मरो का सवाल

अखिलेश यादव अपने कार्यकाल से हमेशा प्रयोग ही करते आये हैं और एक भी प्रयोग सफल नहीं हुआ। चाहे व बसपा के साथ गठबंधन हो या कांग्रेस के साथ, सभी फ्लाप ही रहे। अब वे छोटी पार्टियों के साथ आ रहे हैं। यह चुनाव साबित करेंगे कि अपने पिता मुलायम सिंह यादव की सियासी विरासत को खत्म करने में अखिलेश यादव ‘दूसरे अजीत सिंह’ होंगे या नहीं। दिवंगत अजीत सिंह ने भी पार्टी की विचारधारा से समझौता कर अपने पिता की विरासत के साथ ऐसा ही किया था। यदि यह चुनाव अखिलेश यादव हार जाते हैं तो फिर भविष्य में इनके पनपे के आसार बहुत कम रह जाएंगे। पार्टी भी बिखर जाएगी।

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अमित शाह के लखनऊ दौरे के बाद बदली रणनीति

जो लड़ाई एक समय पर चौतरफा लग रही थी, वह दरअसल कभी भी कई हिस्सों की थी ही नहीं। बीजेपी भले ही बसपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी पर हमले कर रही हो लेकिन अमित शाह के लखनऊ दौरे के बाद रणनीति बदल गई है। अब बीजेपी ने सपा को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। पार्टी को सपा के साथ आमने-सामने की भिड़ंत में ज्यादा फायदा दिख रहा है। वहीं दूसरी ओर मायावती का रवैया भी आक्रामक नहीं है। एक समय पर वे सपा पर जिस तरह हमले कर रही थीं, वह अब नजर नहीं आ रहा है। इसके अलावा बसपा के सभी दिग्गज नेता भी चले गए हैं।

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नवम्बर में कांग्रेस, आप व बसपा की गतिविधियां पड़ी धीमी

नवंबर में देखें, तो कांग्रेस, बसपा या आप की तरफ से यूपी में शायद ही कोई गतिविधि हुई है। इस समय जमीन पर केवल भाजपा और सपा ही सक्रिय नजर आ रहे हैं। योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव लगातार राज्य में बड़ी जनसभाएं कर रहे हैं। सपा प्रमुख ने 13 नवंबर से योगी के गढ़ गोरखपुर में समाजवादी विजय यात्रा की शुरुआत की। सीएम अमित शाह के साथ अखिलेश यादव के क्षेत्र आजमगढ़ में रहे। बीजेपी नवंबर में राज्य चार बड़ी यात्राओं पर विचार कर रही है।

यह भी पढ़ेंः-दूसरी पार्टियों के निष्कासितों का आगमन सपा में बढ़ाएगा अंदरूनी कलह

राजनीतिक विश्लेषक उपेन्द्र नाथ की रिपोर्ट
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