उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने कोर्ट परिसर में मौजूद हर शख्स को हैरान कर दिया। आमतौर पर अदालत में आरोपी खुद चलकर या पुलिस की निगरानी में पहुंचते हैं, लेकिन इस बार नजारा कुछ अलग था। 70 वर्षीय रामदरस यादव को उनके परिजन चारपाई पर लिटाकर एसीजेएम कोर्ट में सरेंडर कराने पहुंचे। जैसे ही चारपाई को लेकर लोग कोर्ट परिसर में दाखिल हुए, वहां मौजूद वकील, फरियादी और अन्य लोग ठिठक गए।
रामदरस यादव बरेसर थाना क्षेत्र के न्यायायीपुर विद्यापुर गांव के रहने वाले हैं। उनके खिलाफ चेक बाउंस का मामला दर्ज था, जिसमें उन्हें पहले ही सजा सुनाई जा चुकी थी। अदालत के आदेश का पालन करने के लिए जब वे पेश नहीं हुए तो अंततः परिवार वाले उन्हें चारपाई पर लिटाकर कोर्ट लेकर आए। बताया गया कि वे बीमार हैं और चलने-फिरने की हालत में नहीं हैं। हालांकि, इस दावे को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
गाजीपुर अदालत में पेशी के बाद न्यायालय ने पूर्व में सुनाई गई सजा के अनुसार उन्हें जेल भेजने का आदेश दे दिया। यह पूरा घटनाक्रम कुछ ही मिनटों में हुआ, लेकिन इसकी चर्चा पूरे जिले में फैल गई। सोशल मीडिया पर भी इस अनोखे सरेंडर की खूब चर्चा हो रही है।
9 लाख रुपये के चेक से शुरू हुआ विवाद
पूरा मामला करीब एक साल पुराना बताया जा रहा है। परिवादी अजीत राम के अनुसार, रामदरस यादव ने ईंट-भट्ठा चलाने के लिए उनसे लगभग 9 लाख रुपये उधार लिए थे। रकम वापस करने के लिए उन्होंने एक चेक दिया, लेकिन बैंक में लगाने पर वह चेक बाउंस हो गया। इसके बाद मामला कानूनी मोड़ लेता चला गया।
अजीत राम ने अदालत में शिकायत दर्ज कराई। मामला एसीजेएम कोर्ट में चला, जहां दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं। सबूत और तथ्यों के आधार पर अदालत ने धारा 138 NI एक्ट के तहत आरोपी को दोषी करार दिया। करीब एक साल पहले कोर्ट ने रामदरस यादव को तीन महीने की सजा और 12 लाख रुपये के जुर्माने का आदेश दिया था।
यह जुर्माना मूल राशि, अतिरिक्त भुगतान और अन्य कानूनी खर्चों को मिलाकर तय किया गया था। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि आरोपी निर्धारित राशि ब्याज सहित अदा करे। इसके बावजूद समय पर आदेश का पालन नहीं हुआ, जिसके बाद मामला फिर चर्चा में आया।
हाईकोर्ट से भी नहीं मिली राहत
सजा सुनाए जाने के बाद रामदरस यादव ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उन्हें उम्मीद थी कि निचली अदालत के फैसले पर रोक लग सकती है या राहत मिल सकती है। लेकिन हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए निर्देशों का पालन करने को कहा।
हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद आखिरकार उन्हें एसीजेएम कोर्ट में आत्मसमर्पण करना पड़ा। परिजन का कहना है कि वे गंभीर रूप से बीमार हैं और चलने में असमर्थ हैं, इसलिए उन्हें चारपाई पर लिटाकर लाया गया। हालांकि, परिवादी पक्ष के अधिवक्ता रामाश्रय सिंह ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि आरोपी बीमारी का बहाना बनाकर सजा से बचने की कोशिश कर रहा है।
कोर्ट ने किसी भी बहाने को स्वीकार नहीं किया और पहले से सुनाई गई सजा के अनुसार उन्हें जेल भेजने का आदेश दे दिया। अदालत का रुख साफ था कि न्यायिक आदेश का पालन हर हाल में होना चाहिए।
कितना भुगतान हुआ
गाजीपुर अदालत के आदेश के मुताबिक, कुल जुर्माने में से आरोपी अब तक 4 लाख 40 हजार रुपये अदा कर चुका है। शेष 7 लाख 60 हजार रुपये में से 7 लाख 10 हजार रुपये परिवादी अजीत राम को और 50 हजार रुपये सरकारी खाते में जमा कराने का निर्देश दिया गया है। साथ ही 9 प्रतिशत ब्याज के साथ पूरी रकम लौटाने की बात भी कही गई थी।
अब जबकि आरोपी जेल भेजे जा चुके हैं, कानूनी प्रक्रिया के तहत वे आगे भी राहत के लिए प्रयास कर सकते हैं, लेकिन फिलहाल उन्हें सजा काटनी होगी। यह मामला एक बार फिर यह संदेश देता है कि चेक बाउंस जैसे आर्थिक अपराधों को अदालतें गंभीरता से लेती हैं और दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई करती हैं।
गाजीपुर में चारपाई पर हुआ यह सरेंडर सिर्फ एक कानूनी घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक चर्चा का विषय भी बन गया है। लोग इस बात पर भी बहस कर रहे हैं कि क्या वाकई आरोपी बीमार थे या यह सजा से बचने की रणनीति थी। जो भी हो, अदालत का आदेश स्पष्ट है और कानून के सामने सभी बराबर हैं।
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