मौलाना अरशद मदनी की एक टिप्पणी ने अयोध्या में नया विवाद खड़ा कर दिया है। भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर दिए गए इस बयान पर साधु-संतों ने तीखी प्रतिक्रिया जताई है। आध्यात्मिक गुरु रामविलास वेदांती ने साफ कहा कि भारत में किसी भी समुदाय को दबाने की बात करना वास्तविकता से दूर है। उनका कहना था कि देश के लगभग हर राज्य में मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व मौजूद है—विधायक, सांसद और प्रशासनिक पदों पर उनकी उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि देश में किसी प्रकार का भेदभाव उन्हें रोक नहीं रहा। वेदांती के अनुसार, भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी समुदायों को समान अवसर मिलते हैं, और इस आधार पर दमन का आरोप लगाना उचित नहीं कहा जा सकता।
वेदांती ने आगे कहा कि धार्मिक शिक्षा से जुड़े संस्थान जैसे मदरसे भी देशभर में बिना किसी बड़े प्रतिबंध के चलते आए हैं। वेदांती का तर्क था कि यदि किसी समुदाय के साथ कठोरता होती, तो उनके धार्मिक संस्थानों पर सबसे पहले इसका असर दिखता, लेकिन भारत में ठीक उल्टा होता है, मदरसों की संख्या बढ़ रही है और उनका संचालन स्वतंत्र रूप से होता है। उनके मुताबिक, भारत का संविधान हर व्यक्ति के अधिकार को सुरक्षित रखता है, और यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता केवल कागज़ों पर नहीं बल्कि व्यवहार में भी मौजूद है।
दुनिया से तुलना, वेदांती ने उठाया बड़ा सवाल
वेदांती ने मदनी के बयान का जवाब देते हुए वैश्विक स्तर पर मुसलमानों की स्थिति का उदाहरण दिया। उनके अनुसार, कई देशों में धार्मिक गतिविधियों पर कड़े नियम लागू हैं और सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक प्रार्थना जैसी गतिविधियों की अनुमति नहीं होती। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में मुसलमानों को प्रतिबंधित धार्मिक वातावरण का सामना करना पड़ता है, जबकि भारत में इसके ठीक विपरीत माहौल देखने को मिलता है। देश के कई हिस्सों में सड़कों पर जुमे की नमाज़ अदा करने की घटनाएं आम हैं, और इस पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं होती।
वेदांती के मुताबिक, भारत एक ऐसा देश है जो विविधताओं को स्वीकार करता है और जहां धर्म के आधार पर किसी की स्वतंत्रता सीमित नहीं की जाती। उन्होंने कहा कि विश्व के कई देशों में धार्मिक संरचनाओं में बदलाव या तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आती हैं, जबकि भारत में ऐसे मामलों पर कानून और प्रशासन दोनों संवेदनशील रहते हैं। वेदांती का मानना था कि विश्व की परिस्थितियों को देखते हुए भारत को कट्टर या प्रतिबंधात्मक कहना बिल्कुल गलत तस्वीर पेश करता है।
अयोध्या के कई संतों ने वेदांती की बातों का समर्थन किया और कहा कि किसी बयान का आधार तथ्य और संदर्भ होना चाहिए, क्योंकि ऐसे मुद्दे सीधे समाजिक सद्भाव को प्रभावित कर सकते हैं।
सीताराम दास महाराज ने कहा,‘मदनी हकीकत देखना नहीं चाहते’”
विवाद तब और तेज हो गया जब अयोध्या के सीताराम दास महाराज ने भी इस मुद्दे पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। महाराज का कहना था कि भारत में मुसलमान न केवल सुरक्षित हैं बल्कि कई उच्च पदों पर भी पहुंचते रहे हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों में मुस्लिम समुदाय के लोग मंत्री रहे हैं, और देश के संवैधानिक पदों पर भी उनका प्रतिनिधित्व रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि जिस समुदाय को देश में इतना सम्मान मिला हो, उसके प्रति भेदभाव का आरोप लगाना किसी भी तरह उचित नहीं।
सीताराम दास महाराज ने कहा कि दुनिया के कई देशों में मस्जिदों को हटाए जाने की खबरें आती रहती हैं, लेकिन भारत में धार्मिक स्थलों को सुरक्षा और सम्मान दोनों मिलता है। उन्होंने टिप्पणी की कि मदनी शायद देश की वास्तविक स्थिति को देखने के लिए तैयार नहीं हैं और केवल नकारात्मक पहलुओं को सामने रखकर भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। महाराज ने कहा, “भारत वह जगह है जहां हर समुदाय को पूरी स्वतंत्रता है। ऐसे में समाज के बीच गलत धारणा फैलाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।”
अयोध्या में साधु-संतों की यह प्रतिक्रिया सिर्फ बयान का विरोध नहीं, बल्कि उस बहस का हिस्सा बनी जिसमें यह सवाल उठता है कि धार्मिक नेताओं को जिम्मेदार बयानबाज़ी करनी चाहिए या नहीं। विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे मुद्दे तब और संवेदनशील हो जाते हैं जब उन्हें राजनीतिक या धार्मिक रंग दे दिया जाता है। इस विवाद ने एक बार फिर देश में धार्मिक स्वतंत्रता, अधिकारों और सामाजिक सद्भाव जैसे मुद्दों को केंद्र में ला दिया है।
