संभल हिंसा मामले में कोर्ट के ताज़ा आदेश ने प्रशासन और पुलिस महकमे में हलचल मचा दी है। चंदौसी की अदालत ने तत्कालीन CO अनुज चौधरी, तत्कालीन कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर और अन्य अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया है। यह आदेश हिंसा में घायल हुए एक युवक के पिता की याचिका पर दिया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उनके बेटे को पुलिस की गोली लगी थी। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी विभांशु सुधीर ने 9 जनवरी को यह फैसला सुनाया। कोर्ट के इस कदम को पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे पहले इस पूरे मामले में प्रशासनिक स्तर पर न्यायिक जांच पूरी होने का दावा किया जा चुका है। आदेश सामने आते ही राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि आगे इस मामले की दिशा क्या होगी।
अखिलेश यादव का तीखा हमला: ‘पक्षपाती पुलिसकर्मी याद करेंगे बीजेपी का फार्मूला’
कोर्ट के आदेश के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने CO अनुज चौधरी मुद्दे पर खुलकर हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि अब किसी को बचाने कोई नहीं आएगा। अखिलेश यादव ने पुलिस पर सत्ता के इशारे पर काम करने का आरोप लगाते हुए कहा कि ऐसे पक्षपाती पुलिसकर्मी अब अकेले बैठकर बीजेपी का फार्मूला याद करेंगे—“पहले इस्तेमाल करो, फिर बर्बाद करो।” उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी किसी की सगी नहीं होती और जब समय आता है तो अपने लोगों को भी अकेला छोड़ देती है। अखिलेश के इन बयानों को सिर्फ पुलिस नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल पर हमला माना जा रहा है। सियासी जानकारों का मानना है कि यह बयान आने वाले समय में इस मामले को और ज्यादा राजनीतिक रंग दे सकता है।
कोर्ट की अवमानना पर सवाल, पुलिस के रुख पर उठी नई बहस
अखिलेश यादव ने एक दूसरे पोस्ट में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के बयान पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अगर कोई बड़ा अधिकारी कोर्ट के आदेश को अवैध बता रहा है तो क्या यह अदालत की अवमानना नहीं मानी जाएगी। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सत्ता की चापलूसी में जरूरत से ज्यादा सख्ती दिखाना कहीं महंगा न पड़ जाए। वहीं दूसरी ओर संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई ने साफ किया है कि पुलिस इस आदेश के खिलाफ अपील दायर करेगी और फिलहाल एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी। एसपी का कहना है कि इस पूरे मामले में पहले ही न्यायिक जांच हो चुकी है, इसलिए दोबारा केस दर्ज करना उचित नहीं है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि कोर्ट के आदेश को सीधे तौर पर नजरअंदाज करना पुलिस के लिए आगे मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
क्या है संभल विवाद की जड़? मस्जिद- मंदिर विवाद से भड़की हिंसा
संभल हिंसा की कहानी पिछले साल 19 नवंबर से शुरू होती है, जब वकील हरि शंकर जैन और विष्णु शंकर जैन समेत कुछ हिंदू याचिकाकर्ताओं ने जिला अदालत में दावा किया कि शाही जामा मस्जिद, पहले से मौजूद हरिहर नाथ मंदिर के ऊपर बनाई गई है। अदालत के आदेश पर उसी दिन सर्वे कराया गया और 24 नवंबर को दूसरा सर्वे हुआ। दूसरे सर्वे के बाद संभल में हालात बिगड़ गए और हिंसा भड़क उठी। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई, जबकि 29 पुलिसकर्मी घायल हुए थे। पुलिस ने इस मामले में 12 एफआईआर दर्ज कीं और करीब 2,000 लोगों को नामजद या आरोपी बनाया। इनमें समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर रहमान बर्क और मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष जफर अली जैसे नाम भी शामिल हैं। अब कोर्ट के ताजा आदेश ने इस पूरे मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है और यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी गहराई से जांच होगी।
