उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में बीते 6 दिनों से धरने पर बैठे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। बताया जा रहा है कि उन्हें बुखार हो गया है, जिसके चलते वे लगातार सार्वजनिक रूप से सामने भी नहीं आ पा रहे हैं। जानकारी के मुताबिक, शंकराचार्य दिन में सिर्फ दो बार ही पालकी पर बाहर आए, जबकि बाकी समय वे अपने वैन में आराम कर रहे हैं। इस घटनाक्रम से उनके अनुयायियों और मेले में मौजूद श्रद्धालुओं की चिंता बढ़ गई है। धरने के कारण वे अपने शिविर में लौटने से भी इनकार कर रहे हैं, जिससे उनकी दैनिक गतिविधियां और धार्मिक कार्यक्रम दोनों प्रभावित हो रहे हैं। प्रशासन और संत समाज की नजर अब उनकी सेहत के साथ-साथ इस पूरे विवाद के समाधान पर भी टिकी हुई है, क्योंकि यह मामला लगातार तूल पकड़ रहा है और वसंत पंचमी के स्नान पर्व से पहले स्थिति और संवेदनशील हो गई है।
मौनी अमावस्या से शुरू हुआ विवाद
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत मौनी अमावस्या के दिन हुई थी, जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद संगम स्नान के लिए पालकी में जा रहे थे। शंकराचार्य का आरोप है कि उस दौरान प्रशासन ने उन्हें संगम तक पहुंचने से रोक दिया और उनके शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की की गई। इसी नाराजगी के कारण उन्होंने उसी दिन से धरना शुरू कर दिया और अब तक अपने रुख पर कायम हैं। शंकराचार्य ने साफ कहा है कि जब तक प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगता, तब तक वे वसंत पंचमी पर संगम स्नान नहीं करेंगे। उनके समर्थकों का भी कहना है कि यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि संत समाज के सम्मान और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा विषय है। वहीं दूसरी ओर प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर इतने बड़े धार्मिक आयोजन में इस तरह की स्थिति क्यों बनी। लगातार धरना जारी रहने से माघ मेले की व्यवस्थाओं और माहौल पर भी असर पड़ता दिख रहा है, क्योंकि श्रद्धालु बड़ी संख्या में इस मुद्दे को लेकर चर्चा कर रहे हैं।
भक्तों में नाराजगी
इस विवाद में एक बड़ा कारण सवा लाख शिवलिंग स्थापना से जुड़ा मामला भी सामने आया है। जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ के लक्षेश्वर धाम में सवा लाख शिवलिंगों की स्थापना प्रस्तावित है, लेकिन उससे पहले शंकराचार्य को इन शिवलिंगों को प्रयाग की धरती पर लाकर जनता के दर्शन के लिए उपलब्ध कराना था और विधिवत पूजन भी होना था। वर्तमान में स्थिति यह है कि शंकराचार्य बाहर धरने पर बैठे हैं और शिविर के भीतर रखे शिवलिंग पूजा और साधना के इंतजार में हैं। बताया जा रहा है कि सवा लाख में से केवल कुछ शिवलिंग ही प्रयागराज पहुंच पाए हैं, जबकि बड़ी संख्या में शिवलिंग कार्टूनों में पैक होकर रखे हैं। इसके अलावा शिवलिंगों की एक और खेप आनी थी, जो अभी तक नहीं पहुंच सकी है। जब श्रद्धालु शिविर में जाकर शिवलिंगों को इस हालत में देखते हैं, तो वे नाराजगी भी जाहिर कर रहे हैं। कई भक्तों का कहना है कि धार्मिक कार्यों में व्यवधान आना दुखद है और इसका समाधान जल्द होना चाहिए। यही वजह है कि यह विवाद अब सिर्फ स्नान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे जुड़े धार्मिक आयोजन भी प्रभावित होने लगे हैं।
संत समाज की अपील और डिप्टी सीएम की कोशिश
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब संत समाज की ओर से भी शांति और संयम बनाए रखने की अपील सामने आई है। नासिक में मौजूद संत महंत रामस्नेही दास और महंत बैजनाथ ने कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों का हल टकराव से नहीं, बल्कि सम्मानजनक बातचीत और आपसी समझ से निकलना चाहिए। उनका मानना है कि धर्म और व्यवस्था—दोनों के बीच संतुलन बनाकर ही कोई रास्ता निकाला जा सकता है, ताकि श्रद्धालुओं की भावनाएं भी आहत न हों और प्रशासनिक व्यवस्था भी बनी रहे। वहीं विवाद को खत्म कराने के लिए उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भी समाधान की अपील की है। हालांकि अभी तक शंकराचार्य अपने फैसले पर अडिग नजर आ रहे हैं और प्रशासन से माफी की मांग पर डटे हैं। दूसरी तरफ उनकी बिगड़ी तबीयत ने इस पूरे मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वसंत पंचमी से पहले कोई सम्मानजनक समाधान निकल पाएगा, या फिर यह विवाद माघ मेले के सबसे महत्वपूर्ण स्नान पर्व तक खिंच जाएगा।
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