उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक बहुत ही गंभीर और संवेदनशील किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का खुलासा हुआ है, जिसने चिकित्सा जगत और आम लोगों को झकझोर कर रख दिया है। शुरुआती जांच के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में ऐसे केंद्रों पर कम से कम 60 से अधिक किडनी ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं, जिनमें मरीजों और डोनरों दोनों का रिकॉर्ड नहीं रखा गया। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि इन ऑपरेशनों में नियमों के अनुरूप अस्पताल का नियमित स्टाफ मौजूद नहीं था। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह कोई आम रैकेट नहीं, बल्कि सुनियोजित नेटवर्क था जो लंबे समय से बिना रोक-टोक काम कर रहा था।
घटना की जांच कर रहे अधिकारियों का कहना है कि मरीजों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि सब कुछ ठीक-ठाक है, जबकि असल में नियमों की सख्ती और मेडिकल जांच बिल्कुल भी नहीं हो रही थी। इस प्रकार के ट्रांसप्लांट सीधे मानव अधिकारों और स्वास्थ्य सुरक्षा कानून का उल्लंघन हैं, और यह मामला इसलिए भी गंभीर बन गया क्योंकि इसमें गरीब और कमजोर मरीज भी शामिल थे।
सर्जिकल टीम थी केवल खास, अस्पताल स्टाफ नदारद
जांच टीम ने पाया है कि इन अवैध ट्रांसप्लांट के दौरान अस्पताल के नियमित डॉक्टर, नर्स या रिकॉर्ड स्टाफ मौजूद नहीं थे। इसके बजाय, हर ऑपरेशन के लिए एक विशेष सर्जिकल टीम बुलाई जाती थी। यह टीम सिर्फ उस दिन के लिए आती थी, ऑपरेशन कर देती थी और तुरंत विदा हो जाती थी। किसी भी मरीज का पूरा मेडिकल रिकॉर्ड या ऑपरेशन का दस्तावेज़ नहीं रखा जाता था, जिससे बाद में कोई छानबीन मुश्किल हो जाती थी।
पुलिस को जानकारी मिली कि रैकेट संचालक इस आधार पर डॉक्टर और सर्जन की भूमिका निभाने वाले लोगों को विमान, ट्रेन या दूसरी यात्रा के जरिए लाता था, ताकि वे खुद कानपुर में ज्यादा समय न बिताएं और अपनी पहचान छुपी रहे। ऐसे में यह रैकेट किसी अकेले व्यक्ति का काम नहीं लग रहा है, बल्कि यह एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा माना जा रहा है।
आरोपी ड्राइवर से बने डॉक्टर, डोर-टू-डोर सौदे
पुलिस जांच में यह सबसे चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि रैकेट के मुख्य सरगना की शैक्षणिक योग्यता केवल आठवीं पास थी और वह पहले एम्बुलेंस ड्राइवर था। उसने अपने आप को सर्जन बताकर भरोसा जीत लिया था। इस शख्स ने डोर-टू-डोर कंप्यूटर, टेलीफोन और सोशल मीडिया ग्रुप का उपयोग कर मरीज और डोनर को जोड़ा। जांच एजेंसियों ने पाया कि वह टेलीग्राम पर एक डेडिकेटेड समूह चलाता था, जहाँ “ऑपरेशन शेड्यूल” और “दाम” तय किए जाते थे।
डॉक्टरों और सहयोगी स्टाफ के साथ मिलकर यह रैकेट कानपुर के अलग-अलग स्थानों पर इस अवैध ट्रांसप्लांट का संचालन करता था। आरोपियों के पास बहुत से नकदी और दस्तावेज़ पाए गए हैं, जो बाद में जब्त किए गए। पुलिस को ऐसे साक्ष्य भी मिले हैं, जिनसे लग रहा है कि रैकेट का नेटवर्क उत्तर प्रदेश से बाहर भी फैला हुआ है और शायद कुछ राज्यों में भी इसी तरह के ऑपरेशन हुए होंगे।
पीड़ितों की हालत और आगे की जांच
जांच में यह भी सामने आया है कि जिन मरीजों ने इन अवैध ट्रांसप्लांट के जरिए किडनी बदली थी, उनमें से कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं। एक महिला को करीब 80 लाख रुपये खर्च करने के बावजूद संक्रमण की वजह से लखनऊ के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसका इलाज चल रहा है। इस तरह के मामलों से स्पष्ट होता है कि केवल पैसा देने भर से ऑपरेशन सुरक्षित नहीं होता, बल्कि सर्जिकल प्रक्रिया, जांच, और मेडिकल सिस्टम का होना जरूरी है।
जाँच अधिकारी बताते हैं कि कानपुर मेडिकल कॉलेज जैसे सरकारी संस्थानों में किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा नहीं है, इसलिए मरीज इन अवैध केंद्रों की ओर आकर्षित होते रहे। पुलिस ने कई आरोपियों को हिरासत में लिया है और मामले को और आगे बढ़ाकर रैकेट के सारे नेटवर्क का पता लगाया जा रहा है। आरोपियों से पूछताछ जारी है और विशेषज्ञ टीम इस कांड की गहन जांच कर रही है ताकि भविष्य में किसी को भी ऐसा मौका न मिले।
