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रोहित के एक इंजेक्शन और ‘अली’ के चाकू से होता था खौफनाक खेल! कानपुर किडनी कांड में बड़ा खुलासा

कानपुर किडनी कांड का रोंगटे खड़े कर देने वाला खुलासा! जानें कैसे रोहित और दिल्ली का डॉ. अली मिलकर गरीबों को बनाते थे शिकार और कैसे खुली अंगों के इस काले कारोबार की 'कुंडली'।

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कानपुर किडनी कांड: उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया है। शहर में सक्रिय किडनी चोरों के एक ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है, जिसकी कार्यप्रणाली सुनकर पुलिस के भी होश उड़ गए। इस गिरोह की ‘कुंडली’ खंगालने पर पता चला है कि यह कोई छोटा-मोटा गैंग नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित ‘क्राइम सिंडिकेट’ था। कानपुर किडनी कांड का मुख्य किरदार रोहित नाम का एक शख्स था, जिसका काम डोनर को मौत जैसी नींद सुलाना था, जबकि दिल्ली से आने वाला डॉ. अली अपनी सर्जिकल स्किल का इस्तेमाल मासूमों के जिस्म को चीरने के लिए करता था। जांच में सामने आया है कि इस गिरोह ने लालच और मजबूरी का फायदा उठाकर दर्जनों लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ किया है।

बेहोशी का इंजेक्शन और खामोश चीखें: रोहित का खौफनाक रोल

कानपुर पुलिस की गिरफ्त में आए रोहित की भूमिका कानपुर किडनी कांड में सबसे अहम और डरावनी थी। रोहित का काम उन लोगों को ‘हैंडल’ करना था जिन्हें पैसों का लालच देकर कानपुर लाया जाता था। जब पीड़ित को ऑपरेशन टेबल पर ले जाया जाता, तब रोहित उन्हें एनेस्थीसिया का ओवरडोज या विशेष इंजेक्शन देकर बेहोश कर देता था। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, रोहित को मेडिकल फील्ड की थोड़ी-बहुत जानकारी थी, जिसका उसने गलत इस्तेमाल किया। वह यह सुनिश्चित करता था कि जब डॉ. अली अपना काम शुरू करे, तब पीड़ित पूरी तरह सुध-बुध खो चुका हो। पुलिस की पूछताछ में रोहित ने कुबूल किया है कि कई बार डोनर को यह पता भी नहीं होता था कि उनके शरीर का कौन सा अंग निकाला जा रहा है; उन्हें बस एक सामान्य सर्जरी का झांसा दिया जाता था।

दिल्ली का ‘डॉक्टर मौत’ और कानपुर का गुप्त ठिकाना

कानपुर किडनी कांड में जैसे ही रोहित अपना काम पूरा कर लेता, सीन में एंट्री होती थी दिल्ली के ‘डॉक्टर अली’ की। डॉ. अली खास तौर पर दिल्ली से सर्जरी करने के लिए कानपुर आता था। गिरोह ने शहर के बाहरी इलाकों में कुछ ऐसे गुप्त ठिकाने और छोटे क्लीनिक किराए पर ले रखे थे, जहाँ कानून की नजर नहीं पहुंचती थी। डॉ. अली बेहद कम समय में सर्जरी कर किडनी निकाल लेता था और अगली सुबह होने से पहले ही वापस दिल्ली के लिए रवाना हो जाता था। इस गिरोह ने फर्जी कागजात तैयार करने में भी महारत हासिल कर ली थी, जिससे यह दिखाया जा सके कि अंग दान पूरी तरह कानूनी और आपसी सहमति से हो रहा है।

मजबूरी का सौदा और लाखों का काला साम्राज्य

इनका टारगेट हमेशा समाज का सबसे गरीब तबका होता था। कर्ज में डूबे मजदूर या इलाज के लिए भटकते लाचार लोग इनके जाल में आसानी से फंस जाते थे। एक किडनी का सौदा बाजार में 25 से 40 लाख रुपये में होता था, लेकिन जिस व्यक्ति की किडनी निकाली जाती थी, उसे महज 2 से 3 लाख रुपये देकर खामोश कर दिया जाता था। बाकी की मोटी रकम रोहित, डॉ. अली और गिरोह के अन्य गुर्गों के बीच बंट जाती थी। कानपुर किडनी कांड में दिल्ली के बड़े अस्पतालों और इस रैकेट के बीच सेतु का काम कर रही थीं। आने वाले दिनों में कुछ बड़े रसूखदार नामों पर भी गाज गिरना तय माना जा रहा है।

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