अयोध्या में दर्ज हुए गैंगरेप के इस मामले ने पिछले साल पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी थी। नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म के आरोप लगते ही पुलिस ने तेजी से कार्रवाई की और समाजवादी पार्टी से जुड़े नेता मोईद खान को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद मामला सिर्फ अपराध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीति और प्रशासनिक कार्रवाई का भी केंद्र बन गया। मोईद खान के कथित अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलाया गया और उनकी संपत्तियों पर कार्रवाई हुई। उस वक्त सरकार ने सख्त रुख दिखाया और कहा कि कानून सबके लिए बराबर है। मामला बेहद संवेदनशील था, इसलिए जांच और सुनवाई पर पूरे प्रदेश की नजर बनी रही।
कोर्ट में क्या चला, कौन से सबूत बने अहम
मामला विशेष अदालत में चला, जहां दोनों पक्षों की दलीलें और सबूत पेश किए गए। सुनवाई के दौरान सबसे अहम भूमिका वैज्ञानिक जांच, खासकर डीएनए रिपोर्ट ने निभाई। जांच में सामने आया कि पीड़िता से जुड़े जैविक साक्ष्य एक आरोपी से मेल खाते हैं, जबकि मोईद खान के साथ उनका कोई सीधा संबंध साबित नहीं हो सका। अदालत ने यह भी देखा कि बयान और घटनास्थल को लेकर कई जगह विरोधाभास हैं। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने माना कि मोईद खान के खिलाफ लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो पाए। इसी आधार पर अदालत ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया।
नौकर दोषी, नेता बरी: फैसले का मतलब क्या
कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि मामले में शामिल दूसरे आरोपी, जो मोईद खान का नौकर था, उसके खिलाफ सबूत मजबूत पाए गए हैं। इसलिए उसे दोषी ठहराया गया है और सजा पर अलग से फैसला सुनाया जाएगा। इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि किसी मामले में आरोप लगना और दोषी साबित होना दो अलग बातें होती हैं। अदालत ने साफ संकेत दिया कि किसी व्यक्ति को केवल सामाजिक या राजनीतिक दबाव में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कानून सबूत के आधार पर चलता है, न कि धारणा के आधार पर। यही वजह है कि एक आरोपी को सजा की ओर बढ़ाया गया और दूसरे को बरी किया गया।
फैसले के बाद सियासत और समाज में हलचल
कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे न्यायिक प्रक्रिया की जीत बता रहे हैं, तो कुछ सवाल उठा रहे हैं कि शुरुआती कार्रवाई इतनी सख्त क्यों थी। वहीं, यह मामला प्रशासनिक बुलडोजर कार्रवाई और कानून व्यवस्था को लेकर भी नई बहस को जन्म दे रहा है। समाज के लिए यह फैसला एक अहम संदेश भी देता है कि किसी भी मामले में अंतिम सच अदालत में ही तय होता है। साथ ही यह भी जरूरी है कि जांच निष्पक्ष हो और पीड़ित को न्याय के साथ-साथ निर्दोष को सजा न मिले। आने वाले दिनों में यह मामला कानूनी और राजनीतिक चर्चा का विषय बना रह सकता है।
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