सावधान: शरीर के इस अंग को अपना दुश्मन मानता है कोरोना, फिर होती है मरीज की मौत

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कोरोना का खौफ और रौब दोनों ही लगातार बढ़ता जा रहा है। लगातार बढ़ते मौत के आंकड़े अब समस्त विश्व के लिए अत्याधिक चिंता का सबब बन चुके हैं। उधर, अब रूस द्वारा तैयार कर लिए वैक्सीन की खबर से कमोबेश लोग राहत की सांस लेते हुए नजर आ रहे हैं, लेकिन अभी-भी गंभीर होती स्थिति पर पूर्णत: अंकुश लगने की बात कहना मुनासिब न रहेगा। उधर, अब कोरोना वायरस को लेकर एक और बड़ा खुलासा हुआ है, जिसमें उस राज को बेपर्दा किया गया है, जिसमें लगातार यह दावा किया जा रहा है कि कोरोना के चपेट में आने के बाद एकाएक मरीज  की मौत हो जा रही है।

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कोरोना वायरस को लेकर लखनऊ के केजीएमयू अस्पताल के पलमोनरी एन्ड क्रिटिकल केअर मेडिसिन के विभागाध्यक्ष डॉक्टर वेद प्रकाश ही वो शख्स हैं, जिन्होंने कोरोना की चपेट में आने के बाद एकाएक हो जा रही मौत के पीछे की वजह का खुलासा करते हुए कहा कि कोरोना वायरस के चपेट में आने की वजह से मरीजों के फेफड़े में ब्लड क्लॉटिंग हो रही है। डॉक्टरों के मुताबिक, ब्लड  क्लॉटिंग की वजह से ऑक्सिजन के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, जिसके चलते अचानक से मरीजों की मौत हो जाती है।

यहां पर हम आपको बताते चले कि दुनियाभर में कोरोना वायरस के चलते मरीजों में ब्लड क्लॉटिंग की ज्यादा मामले दर्ज किए जा रहे हैं। फिलहाल तो मरीजों में यह ब्लड क्लॉटिंग की समस्याएं क्यों दर्ज की जा रही है। इस पर रिसर्च जारी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, दूसरी  बीमारियों की तुलना में कोरोना वायरस की चपेट में आने आने के बाद मरीजों में ज्यादा ब्लड क्लॉटिंग के ज्यादा मामले दर्ज किए जा रहे हैं।

ऐसे लगता है पता ब्लड क्लॉटिंग के बारे में 
डॉक्टर वेद प्रकाश के मुताबिक, कोरोना से संक्रमित होने के बाद मरीज में ब्लड क्लॉटिंग की समस्या हैं या नहीं इसके लिए पहले डी डायमर्स टेस्ट किए जाते हैं। अगर डायमर्स का लेवल बढ़ा रहता है तो इसके उपचार के लिए लोग ट्रीटमेंट का प्रोटोकॉल अपनाते हैं। बहरहाल, ब्लड क्लॉटिंग की समस्या को दूर करने के लिए डॉक्टर खून के थक्के को कम करने के लिए दवा दे रहे हैं। डॉक्टर के मुताबिक, ब्ल-ड क्लॉटिंग की स्थिति में मरीजों को खून का थक्का कम करने की दवा देकर बचाया जाता है। एक्सरे और सीटी स्केन कर इस बात का पता लगाया जाता है कि आखिर मरीज में ब्लड क्लॉटिंग की समस्या है या फिर नहीं। पलमोनरी हाइपरटेंशन और राइट राइट फेलियर से भी ब्लड क्लॉटिंग का पता लगाया जा सकता है, मगर इसकी सही जांच के लिए सबसे उपयुक्त ऑटोप्सी रहती है। एक रिपोर्ट पर यदि गौर फरमाएं तो ब्लड क्लॉटिंग करीब 30 फीसद कोरोन मरीजों में देखा जा रहा है।

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