कोरोना महामारी में बढ़ी चाइल्ड पोर्नाेग्राफी तो साइबर पर होने लगी निगरानी

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दिल्ली। कभी-कभी समाज में ऐसे विचलन दिखाई देते हैं जो शर्मिंदा कर जाते हैं। लाॅकडाउन जहां लोगों को सुरक्षित बचाने के लिए लगाया था वहीं उसके कुछ स्याह पक्ष भी देखने को मिले हैं। डार्क नेट की नियमित निगरानी के दौरान केरल पुलिस की साइबर क्राइम टीम ने एक नाबालिग लड़की की चैंकाने वाली तस्वीर देखी थी। तीन महीने की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के बाद उस क्षेत्र का पता लगाया गया था। इसके लिए विशेष सॉफ्टवेयर, उपकरण और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर के साथ-साथ आईपी एड्रेस से मदद मिली थी। पुलिस ने कहा कि नाबालिग लड़की और वह घर, जहां इस आपत्तिजनक वीडियो को शूट किया गया था। वह स्थान राज्य के पुलिस मुख्यालय से महज तीन किमी दूर एक अपमार्केट कॉलोनी में होने का पता चला। इस पूरे प्रकरण का अपराधी लड़की का चाचा निकला। ऐसे ही मलप्पुरम में एक अन्य युवक को पकड़ा गया जो आठ साल की लड़की को खिलौने देकर उसका शोषण करता था और उसे फिल्माता था। इस मामले में भी आरोपी और मासूम लड़की का रिश्तेदार निकला। पुलिस अधिकारियों ने कहा कि तस्वीर लेने या जानकारी चुराने के लिए पीड़ितों के वेब कैमरा को टैप करने के लिए मालवेयर के इस्तेमाल के भी सबूत मिले हैं।

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जब इस तरह की घटनायें समाज में मिलती हैं तो लोगों को सोचने पर विवश कर देती हैं। ऐसे में सोचने पर मजबूर होना होगा कि चाइल्ड पोर्नाेग्राफी के खतरे का कोई अंत नहीं है। पिछले साल जनवरी में एक यूएस-आधारित एनजीओ, नेशनल सेंटर फ़ॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन ने भारत में सोशल मीडिया पर अपलोड की गई संदिग्ध चाइल्ड पोर्नाेग्राफ़ी सामग्री पर 25,000 टिपलाइन रिपोर्ट की एक सूची सौंपी थी, जिससे संसद में चर्चा गर्म रही थी। आंकड़ों से स्पष्ट है कि केरल में हालांकि इससे निपटने में काफी प्रगति हुई है। केरल पुलिस साइबरडोम का गठन दीर्घकालिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने और उभरते साइबर खतरों से निपटने के लिए किया गया था। पुलिस ने पी हंट नाम से एक विशेष अभियान शुरू किया। अभियान के परिणामस्वरूप दो साल में 525 मामलों में 428 अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया।

साइबरडोम के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक मनोज अब्राहम बताते हैं कि हमारे साइबर मॉनिटरिंग सेल भू-बाड़ के माध्यम से डार्क नेट की गश्ती करते हैं। हमारे पास मदद करने के लिए कुछ सर्वश्रेष्ठ सॉफ्टवेयर नेटवर्क हैं। यह एक कठिन काम है। एक बार जब हम एक अपराधी की पहचान करते हैं तो हम सर्विस प्रोवाइडर की मदद से उसके आईपी पते की खरीद करते हैं और उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। एक बार स्थान की पहचान हो जाने के बाद हम आगे की कार्रवाई करते हैं। उन्होंने कहा कि हमारे पास सोशल मीडिया में चाइल्ड पोर्नाेग्राफ़ी चलाने वाले व्यक्तियों और समूहों का पता लगाने के लिए अलग-अलग उपकरण और सॉफ़्टवेयर हैं। इंटरपोल, यूएस-आधारित इंटरनेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइड चिल्ड्रन, इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड और अन्य एजेंसियां हमारी मदद करती हैं।

लॉकडाउन के दौरान स्थिति बिगड़ गई। गिरफ्तार किए गए लोगों में से कुछ आईटी पेशेवर और डॉक्टर थे। उन्होंने कहा कि उनमें से कुछ अपराधी थे और उन्हें इलाज की जरूरत थी। चाइल्ड पोर्नाेग्राफ़ी देखना या शेयर करना भारत में अपराध है। इसमें पांच साल की जेल और अधिकतम 10 लाख रुपए जुर्माने की सजा हो सकती है। इंटरपोल के महासचिव जुर्गन स्टॉक ने हाल ही में कहा था कि कोरोना महामारी के दौरान ऐसे अपराधों में इजाफा हुआ है। एक बाल अधिकार कार्यकर्ता ने कहा कि माता-पिता को कलंक का डर सताता है। इन दिनों इंटरनेट की पहुंच काफी अधिक है। यह अपराध अकेले पुलिस द्वारा रोका नहीं जा सकता है। माता-पिता और परिवार के सदस्यों को अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता है। बच्चों और करीबी रिश्ते पर नजर रखनी होगी।

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