शहीदों के नरसंहार की याद दिलाता है ये वृक्ष, जानिए क्या है इसकी ऐतिहासिक कहानी

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यह महज एक वृक्ष नहीं अपितु वह मर्म है, जिसकी परिकल्पना करना किसी भी शख्स के बूते की बात नहीं। जब कभी-भी बात इस दरख्त होगी तो उस मर्म की कहानी का रहस्य का खुलासा खद व खद हो जाएगा, जिसे सुन यकीन मानिए आपकी आंखें एक ऐसे आंसू से तरबतर हो जाएगी, जिस पर विराम लगाना इतना आसान नहीं..तो चलिए अब ज्यादा समय न जाया करते हुए सीधा उस वृक्ष के मर्मरूपी अतीत को जानने और पहचानने की कोशिश करते हैं। ये भी पढ़े :बदलना चाहते हैं किस्मत, तो घर में जरूर लगाएं ये 5 पौधे, पैसों की नहीं होगी कमी

बताया जा रहा है कि इस वृक्ष के रहस्य की कहानी उस मर्म से जुड़ी हुई है, जिसकी इबारतों का आगाज़ 20 फरवरी 1921 के उस नरसंहार से शुरू होता है, जिस सुन यकीन मानिए आपकी आंखें इस कदर नम हो जाएगी, जिसकी परिकल्पना आपने ताउम्र नहीं की होगी।

अभी तक जो इस वृक्ष और नरसंहार के वस्तुस्थिति के बारे में, जो जानकारी मिली है। उसके मुताबिक, मंहतों ने अंग्रेजों से मिलीभगत कर गुरुद्वारा ननकाना पर कब्जा कर लिया था और अपनी मनमानियां शुरु कर दी थी। इतना ही नहीं, इस पूरे प्रसंग में बेहअबदी का स्तर तो यहां तक पहुंच चुका था। आने वाले यात्रियों के साथ बदसलूकी की जाने की लगी। बेअदबी का स्तर यहां तक पहुंच चुका था कि सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया।

वहीं, इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी सिंहों को हुई तो उन्होंने सीधा गुरुद्वारा को इन अंग्रेजों से आज़ादी दिलाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को जाहिर किया और फैसला किया कि हम इसे आज़ाद करवाकर ही रहेंगे। अमिट अतीत की इबारतों के मुताबिक, निहत्थे सिखों पर हमला किया गया। 20 फरवरी  1921 को जत्थेदार लक्ष्मण सिंह ने 200 निहत्थे सिखों पर हमला किया। पहले से तैयार बैठे मंहतों ने गुरुद्वारा को आजाद करने से मना कर दिया और निहत्थे सिखों पर बेरहमी से वार करता गया। ये भी पढ़े :बस्ती दौरे पर सीएम योगी आदित्यनाथ, जनता को मिलेगी बड़ी सौगात

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