sanjay raut

मुंबई। शिव सेना के मुखपत्र सामना (Samana) में आएसएस के सर संघचालक के हिंदू-मुस्लिम भाषण को लेकर बीजेपी पर निशाना साधा गया है। सामना के काॅलम में लिखा गया है कि लोगों को अब उन्माद, धर्मद्वेश की राजनीति नहीं चाहिए। ये सरसंघचालक ने भले ही मान लिया हो, फिर भी उनके राजनीतिक अंग बीजेपी ने यह स्वीकार किया है क्या? सामना ने काॅलम में कई सवाल किया है। संपादकीय में आगे लिखा है कि इस पर विचार किया जाना चाहिए कि सरसंघचालक मोहन भागवत (Mohan Bhagwat)को हिन्दू-मुस्लिम क्यों कहना पड़ रहा है। सभी धर्मों के लोगों का डीएनए एक है। सरसंघचालक ने मुस्लिम समाज को पुकार लगाई है। उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि हिंदुस्तान में इस्लाम खतरे में है इस भय के जाल में न फंसें, क्योंकि धर्म कोई भी हो, पर सभी हिंदुस्तानियों का डीएनए समान ही है। मोहन भागवत ने हिंदू और मुस्लिम में संघर्ष का कारण गलतफहमी बताया है। हिंदू-मुस्लिम का एक साथ होना, ये संकल्पना ही गुमराह करने वाली है। क्योंकि हिंदू और मुसलमान एक ही हैं’ पर वर्तमान में दिल्ली के सत्ताधारियों को क्या ये बातें पसंद आएंगी।

सामना के संपादकीय में तीखे शब्दों में आरोप लगाया गया, ‘एक तरफ घर में ‘बीफ’ मिला ऐसे आरोप लगाकर लोगों की लिंचिंग हो रही है जबकि ऐसे कई राज्यों में गाय का मांस बेचा जाता है। जहां खुद को हिंदुत्ववादी कहने वाली पार्टी की सरकार है। सामना के सम्पादकी से भाजपा की सरकार पर निशाना साधा गया है। इसका सीधा सा मतलब ये है कि सरकार कमाई के जरिए को खत्म करना नहीं चाहती। इससे सरकार की तिजोरी में बड़ी कमाई हो रही है।

सामना में कहा गया है कि एक तरफ गोमांस बिक्री पर, प्रार्थना पद्धति पर मॉब लिंचिंग और दूसरी तरफ हिंदुत्ववादी राज्यों में गोमांस बिक्री, ये ढोंग है। सरसंघचालक ने इसी विसंगति पर हमला बोला है। सरसंघचालक ने उन्मादी तरीके से राज्य चलाने वालों के कान खींचे हैं। सामना में कहा गया है कि उन्माद से बाहर निकलना ही होगा।

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