होली पूजन और होलिका दहन का क्या है शुभ मुहूर्त…आप भी जानिए

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हर साल की तरह इस साल भी होली की धूम साफ दिखाई दे रही है। कान्हा की नगरी में तो काफी समय पहले ही होली की धूम है। लेकिन ये होली जितनी मस्ती भरी भरा त्योहार है उतना ही ये उत्सव धार्मिक और सामाजिक तौर भी महत्व रखता है। होती में नावन्नेष्टि यज्ञ भी सम्पन्न होता है। होती को प्रह्लाद के नाम से भी जानते है तो वही ये त्योहार पौराणिक और धार्मिक रूप से भी काफी खास है। इस दिन आम्रमंजरी और चन्दन को मिलाकर खाने का बड़ा माहात्म्य है। वही इस से एक दिन पहले होलिका की पूजा की जाती है उसके बाद दहन किया जाता है। जो बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखा जाता है।

पूजा की विधि

होलिका दहन वाले दिन लोग नहाकर होलिका व्रत का संकल्प लेते है। जिसके बाद दोपहर में होलिक दहन स्थान को पवित्र जल शुद्ध किया जाता है। फिर वहा पर सूखी लकड़ी, सूखे उपले और सूखे कांटे डाले जाते है। जिसके बाद रात को पूजा के मुहूर्त पर पूजा किया जाती है। इस दौरान सभी लोग होलिका की तीन परिक्रमा लगाते है और अर्घ्य देते है। घर से लाए हुए जौ, गेहूं, चने की बालों को होली की ज्वाला में भूने और होली की अग्नि और भस्म लेकर घर आएं और पूजा वाली जगह रखें।

बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व

आपको बता दे कि समाज में होली को मनाने के लिए भी एक कहानी है। इस कथा में हिरण्यकश्यप की बहन, अपने भाई के बहकावे में आ जाती हैं और बहकावे में ही वे प्रहलाद को जीवित जलाने के लिए गोदी में लेकर आग में बैठ जाती है। लेकिन भक्त प्रहलाद भगवान विष्णु के भक्त होते है। जिसके चलते उन्हें आग मे आंच तक नहीं आती। और होलिका आग में दहन हो जाती है। वही आखिर मे हिरण्यकश्यप भी मारा गया। इसी कहानी का निष्कर्श के तौर पर कहा जाता है कि ये त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत है।

हालांकि आज का दिन किसानो के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है। होली के समय ही किसानो का नया धान पक कर तैयार होता है। और मान्यता है कि हिन्दू धर्म में हर चीज सबसे पहले भगवान को अर्पण की जाती है। इसलिए आज के दिन किसान अपने अन्न को भगवान को समर्पित करते है।

होलिका दहन मुहूर्त
प्रदोष-व्यापिनी फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन प्रदोष काल में होलिका-दहन किया जाता है। इसमें भद्रा वर्जित है। इस वर्ष विक्रम संवत 2076 में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा 20 मार्च बुधवार को सुबह 10 बजकर 44 मिनट से आरंभ होकर अगले दिन 21 मार्च बृहस्पतिवार को प्रातः 7 बजकर 12 मिनट तक विद्यमान रहेगी। प्रदोष व्यापिनी निशामुखी पूर्णिमा 20 मार्च बुधवार को है। अतः होलिका दहन 20 मार्च को ही सर्वमान्य रहेगा।यहां जली थी होलिका, इस स्थान पर प्रगट हुए थे भगवान नृसिंहध्यान रहे होलिका दहन वाले दिन भद्रा भी सुबह 11 बजे से रात्रि 8 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। इसलिए रात्रि 9 बजे से 10 बजे तक भद्रा मुक्त काल में होलिका दहन समग्र राष्ट्र तथा समाज के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा।21 मार्च बृहस्पतिवार सन 2019 ई॰ को प्रातः 7 बजकर 12 मिनट तक उदयकाल में पूर्णिमा होने के कारण चैतन्य महाप्रभु जयंती, दारूणरात्रि हुताशनी, अष्टाह्निक जैन व्रत समापन, होलाष्टक समाप्त, होलिका धूली धारण, धुलैण्डी, होलामहोत्सव परंपरानुसार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा

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