Friday, February 3, 2023

शहीद दिवस: ऐसे बीता था भगत सिंह का आखिरी दिन

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अंग्रेजी हुकुमत के नाक में दम कर चुके देश के शहीद-ए-आजम भगत सिंह को उनके दो और वीर क्रांतिकारी दोस्तों शिवराम राजगुरु और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी। इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। लाहौर (पाकिस्तान) में भगत सिंह, सुखदेव और शिवराम राजगुरु को फांसी दी गई थी। जब भगत सिंह को फांसी दी गई, उस समय उनकी उम्र सिर्फ 23 साल थी। उन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों और कदमों से अंग्रेजी हकूमत की जड़े हिला दी थीं। उन्होंने असेंबली में बम फेंककर अंग्रेजी हकूमत में खौफ पैदा कर दिया था।

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1928 को दिल्ली की असेंबली में ‘पब्लिक सेफ़्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’  पर बहस चल रही थी,  जो ब्रिटिश सरकार पेश कर रही थी। तभी असेंबली के उस हिस्से में, जहां कोई नहीं बैठा हुआ था, वहां बम फेंककर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिए। हालाकि विस्फ़ोट में किसी की मौत नहीं हुई थी। वही बम फोड़ने के बाद दोनों कांतिकारी मौके से भागे नहीं बल्कि खुद को गिरफ़्तार करवाया। जिसके बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर असेंबली में बम फेंकने का केस चलाया गया।

वहीं भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने इसी साल लाहौर में एक ब्रिटिश जूनियर पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी। तीनों पर सांडर्स को मारने के अलावा देशद्रोह का केस चला। जिसमें उन्हें दोषी माना गया। वहीं बटुकेश्वर दत्त को असेंबली में बम फेंकने के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई गई। 7 अक्टूबर 1930 को फैसला सुनाया गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटकाया जाए। फांसी का दिन 24 मार्च 1931 तय किया गया था। लेकिन इस दिन को अंग्रेजों के उस डर के रूप में भी याद किया जाना चाहिए, जिसके चलते इन तीनों को 11 घंटे पहले ही फांसी दे दी गई थी।

दरअसल तीनों क्रांतिकारियों की फांसी की सजा पूरे देश में आग की तरह फैल गई। जिसके बाद इस फैसले के खिलाफ देश भर में जिस तरह से प्रदर्शन और विरोध जारी हुआ उससे अंग्रेजी सरकार डर गई। और जिसका नतीजा यह हुआ कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को चुपचाप तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई थी। जिस वक्त भगत सिंह जेल में थे, उन्होंने कई किताबें पढ़ीं थी। फांसी लगने से पहले भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे।

भगत सिंह जेल में करीब 2 साल रहे। इस दौरान वह लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। भगत सिंह को जब जेल के अधिकारियों ने यह सूचना दी कि उनकी फांसी का समय आ गया है तो उन्होंने कहा था- ‘ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले। फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले – ‘ठीक है अब चलो’। फांसी पर जाते समय भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू तीनों मस्ती से ‘मेरा रंग दे बसन्ती चोला’  गाना गाते रहे।

 

 

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