Saturday, February 4, 2023

मौत से ठीक पहले मुस्कुरा रहे थे भगत सिंह…शहीद दिवस पर ये बातें जरूर जानिए

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23 मार्च 1931 ये वो तारीख है जिस दिन भारत के तीन वीर क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु आजादी के वो मस्ताने थे जिन्हें मौत से भी कोई खौफ नहीं था। इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। आइए जानते हैं इस दिन से जुड़ी कुछ रोचक बातें…

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भगत सिंह करीब दो साल जेल में रहे। इस दौरान वह दुखी होने के बजाय खुश थे। उन्हें इस बात का गर्व था कि  उन्हें देश के लिए कुर्बान होने का मौका मिल रहा है।

बताया जाता है कि जिस दिन उनको फांसी के लिए ले जाया जा रहा था उस वक्त भी अपने साथियों सुखदेव और राजगुरु के साथ ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गाते जा रहे थे।

भगत सिंह को जिस वक्त फांसी पर चढ़ाया जा रहा था उस वक्त भी उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। शहीद होते वक्त भगत सिंह और सुखदेव सिर्फ 23 साल के थे और राजगुरु 22 के।

23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दी गई थी। उन्हें 24 मार्च की सुबह फांसी देने की सजा सुनाई दी गई थी लेकिन पूरे देश में विरोध और गुस्से को देखते हुए एक दिन पहले ही शाम को चुपचाप फांसी दे दी गई थी।

जेल में रहने के दौरान भगत सिंह ने कई किताबें पढ़ी। जिस दिन उन्हें फांसी के लिए ले जाया जा रहा था उस दिन वो लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। इस दौरान वह लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा।

भगत सिंह को जब जेल के अधिकारियों ने यह सूचना दी कि उनकी फांसी का समय आ गया है तो उन्होंने कहा था- ‘ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले। फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले – ‘ठीक है अब चलो’।

भारत में स्वतंत्रता संग्राम में लाला लाजपत राय की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वह साइमन कमिशन के विरोध में शामिल थे, जिसमें हुए लाठीचार्ज में वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे और बाद में 17 नवंबर 1928 को उनकी मौत हो गई। भगत सिंह ने सुखदेव,राजगुरु और चंद्रशेखऱ आजाद के साथ मिलकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने की कसम खा ली थी।

लाला लाजपत राय की मौत के ठीक 1 महीने बाद लाहौर में 17 दिसंबर 1928 को राजगुरु और भगत सिंह ने एएसपी जॉन पी सांडर्स को गोली मार दी। हालांकि उनका निशाना लाठीचार्ज कराने वाला जेम्स ए स्कॉट था लेकिन पहचानने में चूक होने पर सांडर्स की हत्या कर दी। भगत सिंह और राजगुरु का पीछा करने वाले एक भारतीय कॉन्सेटबल को आजाद ने गोली मार दी। भगत सिंह और उनके साथ कई महीनों तक फरार रहे।

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