अमेठी-रायबरेली से मुश्किल में पड़ सकती है कांग्रेस, मायावती के ऐलान का इंतजार

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उत्तर प्रदेश में अमेठी और रायबरेली को कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है, लेकिन काफी लंबे समय से बीजेपी कांग्रेस को उसी के गढ़ में घेरने की तैयारी में जुटी है. वहीं दूसरी तरफ जहां कांग्रेस को उस समय राहत मिली थी जब सपा-बसपा ने अमेठी और रायबरेली में अपने उम्मीदवार न उतारने के लिए फैसला किया था. लेकिन अब माना जा रहा है कि सपा-बसपा का इरादा बदल सकता है. माना ये जा रहा है कि सपा-बसपा गठबंदन अब अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए इन दोनों सीटों पर उम्मीदवार न उतारने का मन बदल लिया है.

क्या कहता है समीकरण

अमेटी और रायबरेली सीट पर दलित और ओबीसी खासकर यादव समुदाय का वोट बैंक अच्छी तादाद में है. जहां अमेठी में लगभग 4 लाख मुसलमान हैं, तो वहीं रायबरेली में लगभग 3 लाख के आसपास यादव हैं. ऐसे में अगर सपा-बसपा अपना उम्मीदवार मैदान में उतारते हैं तो फिर वोटों का बिखराव होना स्वाभाविक है, जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हो सकता है. 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा रायबरेली की 4 सीटें जीती थी, तो कांग्रेस को खाली हाथ लौटना पड़ा था.

अब तक क्या रहा

नजर अगर 2014 के लोकसभा चुनाव पर दौड़ाए तो उस वक्त अमेठी सीट से बीजेपी ने स्मृति ईरानी को तो कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी मैदा में थे. जहां राहुल को लगभग 4 लाख, तो ईरानी को 3 लाख वोट मिले थे. वहीं सपा ने अपना कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा था. बावजूद इसके राहुल ईरानी से 1 लाख वोटं से ही जीत पाए थे. वहीं इसी साल रायबरेली से कांग्रेस की सोनिया गांधी और बीजेपी की तरफ से अजय अग्रवाल कौ मैदान में उतारा था. यहां मोदी लहर में अजय कुछ खास नहीं कर पाए थे.

कांग्रेस की बढ़ सकती हैं मुश्किलें

जहां बीजेपी ने इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को घेरने का प्लान बना रखा है, तो वहीं अगर सपा-बसपा गठबंधन अपना फैसला बदलते हैं और मैदान में उम्मीदवार उतारते हैं. ऐसे में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के लिए अपने गढ़ को बचाने के लिए लोहे के चने चबाने पड़ सकते हैं. ये भी पढ़ें: बिहार में लोकसभा चुनाव से पहले हुआ बड़ा खेल, कन्हैया के टिकट पर संकट

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