नई दिल्ली। महिलाओं के अधिकार को लेकर उच्चतम न्यायालय बहुत गम्भीर है, यही कारण है कि शीर्ष अदालत ने महिलाओं को वह अधिकार दिये, जो वास्तव में जरूरी था, इस अधिकार का समाज व सरकार दोनों विरोध करते थे, लेकिन अदालत का यह निर्णय सबको स्वीकार ही करना पड़ा। सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं को एनडीए यानी नेशनल डिफेंस एकेडमी की परीक्षा में भी बैठने की अनुमति देकर आधी आबादी के हक में एक और फैसला दिया है। पिछले 71 सालों के इतिहास में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार महिलाओं के अधिकारों की हिमायत की है और ऐसे कई मौके आए हैं, जब सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में फैसले दिए। इतना ही नहीं, सरकार द्वारा लिंग के आधार पर भेदभाव किए जाने पर भी सुप्रीम कोर्ट उनके हक में खड़ा रहा है।

एनडीए की परीक्षा दे सकेंगी लड़कियां : महिलाओं को परमानेंट सर्विस कमीशन में शामिल करने का फैसला देने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को अब एनडीए यानी नेशनल डिफेंस एकेडमी की परीक्षा में भी बैठने की अनुमति दे दी है। यह आदेश इसी साल 5 सितंबर को होने वाली एनडीए की परीक्षा से लागू होगा। इस पर शीर्ष अदालत ने फटकार लगाते हुए कहा कि यदि यह पॉलिसी डिसिजन है तो यह भेदभाव से पूर्ण है। हालांकि 5 सितंबर को परीक्षा में बैठने का आदेश सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन होगा।

वर्कप्लेस प्रोटेक्शन : 1997 में विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नियोक्ताओं के लिए अपनी महिला कर्मचारियों की शिकायतों के निवारण के लिए एक तंत्र बनाने के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए थे। घरेलू कानून की अनुपस्थिति में कोर्ट ने सभी कार्यस्थलों पर कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामलों पर काबू पाने और उसकी जांच करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने की आवश्यकता महसूस की थी। हालांकि, बाद में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम भी 2013 में पारित किया गया था।

सबरीमाला मामला : सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म वाली महिला श्रद्धालुओं को अनुमति नहीं देने की सदियों पुरानी प्रथा के खिलाफ जाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि मंदिर सभी उम्र की महिलाओं के लिए खुले होने चाहिए और कहा कि भक्ति लिंग भेदभाव का मामला नहीं होता है। बता दें कि 28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने 10 साल से 50 साल के उम्र की महिलाओं को सबरीमाला के भगवान अयप्पा के मंदिर में प्रवेश की इजाजत दी थी। साथ ही कोर्ट ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक की परंपरा को असंवैधानिक बताया था।

ट्रिपल तालक केस : 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने शायरा बानो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में तीन तलाक को असंवैधानिक बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रिपल तालक की प्रथा, जिसके तहत एक मुस्लिम व्यक्ति तीन बार तलाक बोलकर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है, कुरान का हिस्सा नहीं है। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि तीन तलाक प्रथा (तलाक बिदा) इस्लाम और कुरान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इस तरह इस पर प्रतिबंध लगा दिया था।

डिफेंस में महिलाओं की भागीदारी : रक्षा मंत्रालय बनाम बबीता पुनिया मामले में 2020 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को रक्षा बलों की कमांडिंग भूमिकाओं में स्थायी कमीशन के लिए पात्र बनाया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से महिला अधिकारियों को पदोन्नति, पेंशन, और बहुत कुछ के मामले में अपने पुरुष सहयोगियों के बराबर बना दिया। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सेना को फटकार भी लगाई थी।

सम्पत्ति में बेटा-बेटी का समान हक : पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया और कहा कि पैतृक संपत्ति में बेटी का भी बराबर का हक है। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू बेटियों को उसी तरह पारिवारिक संपत्ति के उत्तराधिकारी का दर्जा दिया, जिस तरह से बेटों को पहले से मिलता रहा है। इसने 2005 के कानून का दायरा उन बेटियों तक बढ़ा दिया जिनके पिता कानून लागू होने की तारीख तक जीवित नहीं थे।

फैसला विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा मामले में आया था। दरअसल, कोर्ट ने कहा था कि नौ सितंबर 2005 के बाद से बेटियों के हिंदू अविभाजित परिवार की संपत्तियों में हिस्सा मिलेगा। यहां यह जानना जरूरी है कि इसे लेकर साल 2005 में कानून बना था कि बेटा और बेटी दोनों के पिता की संपत्ति पर बराबर का हक होगा। मगर इसमें यह स्पष्ट नहीं था कि अगर पिता की मृत्यु 2005 से पहले हुई हो तो क्या यह कानून ऐसे परिवार पर लागू होगा या नहीं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा मामले में आया था।

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