कांग्रेस को हराना सिर्फ कांग्रेस के ही वश में…

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  • गलतियों का पुतला बन कर रह गई देश की सबसे पुरानी पार्टी

राजनीतिक विश्लेषक, वरिष्ठ पत्रकार हरिमोहन विश्वकर्मा की त्वरित टिप्पणी

लखनऊ। तेरे नाम से शुरू, तेरे नाम पर खत्म… फिल्म वारिस में फिल्माई गयी पंक्तियां भारतीय लोकतंत्र की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पर चरितार्थ हो रही हैं। कुछ यही पंक्तियां उत्तर प्रदेश सहित 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में दुर्गति को प्राप्त अखिल भारतीय कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की उस समीक्षा बैठक में दोहराई गई जिसमें पार्टी को घोर पराजय और पंजाब में सत्ता खोने पर मंथन करना था। कहा जा रहा है कि कुछ उसी तरह इस बैठक में सोनिया, राहुल और प्रियंका ने हार के लिए खुद को दोषी माने जाने पर सवाल कर उपस्थित सदस्यों से पूछा गया कि अगर वे गांधी परिवार को पराजय के लिए दोषी मानते हैं तो गांधी परिवार के तीनों सदस्य इस्तीफा दे रहे हैं। नतीजा वही, जो होना था। उपस्थित सदस्यों ने राहुल को कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने की मांग की और बैठक खत्म हो गई।

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बैठक के नतीजों से समझा जा सकता है कि कांग्रेस क्यों लगातार दुर्गति को प्राप्त हो रही है। कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से इतर कांग्रेस के अनेक अहम नेताओं ने हालिया पराजयों के लिए कांग्रेस के शीर्ष नेताओ और उनके पिछलग्गू नेताओं को दोषी ठहराया है। इनमें कपिल सिब्बल ने तो सीधे ही गांधी परिवार के सदस्यों से कांग्रेस पर रहम कर पार्टी से बाहर होने का अनुरोध कर डाला है। उधर कांग्रेस के एआईसीसी सदस्य और उत्तर प्रदेश के मीडिया प्रभारी जीशान हैदर लगातार बयान दे रहे हैं कि कांग्रेस को डुबोने का काम कांग्रेसी ही कर रहे हैं। इस चुनाव में बड़े पैमाने पर कांग्रेस नेताओं ने टिकट वितरण में घोटाले और पक्षपात किए हैं। मनीष तिवारी ने भी कांग्रेस की पंजाब में हार पर शीर्ष नेतृत्व की शैली को जिम्मेदार ठहराया है। खुद प्रियंका गांधी जो उप्र चुनाव प्रभारी होने के साथ राष्ट्रीय महासचिव भी हैं, इशारा कर रही हैं कि कुछ जिम्मेदार बड़े नेताओं ने कांग्रेस को धोखा दिया है। प्रियंका ने चुनाव प्रचार के दौरान भी कई बार इशारा किया कि कांग्रेस के बड़े नेताओं, जिन पर पार्टी को जिताने की जिम्मेदारी है, वे केवल स्वयं और परिजनों को जिताने में लगे हैं। माना जा रहा था कि यह इशारा प्रमोद तिवारी जैसे बड़े नेताओं के लिए है जो अपनी बेटी आराधना मिश्रा को जिताने के लिए दिन रात एक कर रहे थे। नतीजा साफ है, आराधना जीत गयीं लेकिन कांग्रेस हार गयी।

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गांधी परिवार को नेतृत्व पर सिमट गयी बैठक

सवाल पूछा जा सकता है कि कांग्रेस राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हार के कारणों पर चिंतन के लिए बुलाई गई थी तो फिर महज गांधी परिवार को नेतृत्व करते रहने की गुहार पर सिमट कर क्यों रह गई? जब पार्टी को हार के लिए जिम्मेदार चेहरों और कारणों पर चिंतन करना चाहिए और उनपर कार्रवाई करनी चाहिए, पार्टी ने चुप्पी साध ली। साफ है कि पार्टी नेतृत्व को पराजयों का सिलसिला रोकने से अधिक इस बात की चिंता है कि पार्टी की कमान गांधी परिवार से इतर किसी बाहरी व्यक्ति के हाथ में न जाये। जबकि पार्टी का एक बड़ा धड़ा, जो पार्टी नेतृत्व और वर्तमान कार्यशैली पर लगातार उंगलियां उठाकर जी 23 के नाम से मशहूर हो गया है, उसके नेताओं को लगातार नजरंदाज कर रहा है।

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दरअसल, पार्टी में एक बड़ा वर्ग है जो अब गांधी परिवार से मुक्ति चाहता है। इस वर्ग के नेताओं को लगता है कि अब कांग्रेस का उद्धार गांधी परिवार को साईड लाईन किए बिना हो ही नहीं सकता। काफी हद तक यह बात सही भी है। राहुल गांधी को लगभग 10 वर्ष हो गए हैं,। परोक्ष-अपरोक्ष रुप से पार्टी में फैसले लेते हुए। अब तक उनमें एक नेतृत्वकर्ता के गुण दूर दूर तक परिलक्षित नहीं हो रहे। सोनिया गांधी उम्र के उस मुकाम पर हैं जहां, उनकी दीर्घायु के लिए प्रार्थना की आवश्यकता है। पार्टी के पास सिर्फ एक चेहरा बच रहा था, प्रियंका का। तो उत्तर प्रदेश में जहां उनके कंधों पर पार्टी के उन्नयन का भार था। वहां पार्टी की 2017 के मुकाबले सीटें और वोट प्रतिशत, दोनों फिसलने के बाद वे भी एक्सपोज हो चुकीं हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि उत्तर प्रदेश में प्रियंका की मेहनत को नंबर मिलना चाहिए। एक समय, उन्होंने मृतप्राय कार्यकर्ताओं में लखीमपुर और हाथरस प्रकरणों के सहारे चेतना तो फूंकी लेकिन वह चुनाव आते-आते दम तोड़ गई। प्रियंका ने रैलियों और रोड शो में भीड़ भी खींचा और लड़की हूं, लड़ सकती हूं, जैसे नारों के बूते आकर्षित भी किया। वर्तमान पार्टी के पास न तो आज सांगठनिक ढांचा है और न संसाधनों की पूंजी। जिसके बल पर प्रियंका की मेहनत को मतदान केंद्रों तक लाया जा सकता है।
तो सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस वाकई खत्म हो गई है, क्या वाकई उसे गांधी परिवार की छाया से मुक्ति की आवश्यकता है। क्या कांग्रेस के दिन अब कभी नहीं बहुरेंगे?

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चिंतन करेंगे तो इन सभी सवालों के जवाब नहीं में ही मिलेंगे। आज भी सचाई यह है कि राष्ट्रीय परिदृश्य में कांग्रेस के अलावा कोई दूसरी पार्टी नहीं है जो उत्तर से दक्षिण, और पूर्व से पश्चिम तक विस्तारित हो। आज भी जब ममता बनर्जी कांग्रेस को नजरंदाज कर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट करने का निर्णय लेती है तो उन्हें घर बैठना पड़ता है। विपक्ष के तमाम बड़े नामों में ममता के अतिरिक्त शरद पवार, उद्धव ठाकरे, चंद्रशेखर राव, अखिलेश यादव, मायावती, जगन रेड्डी, नीतिश कुमार, तेजस्वी यादव आदि के लिए वह मुकाम पाना सपनों में भी संभव नहीं है जो कांग्रेस के पास था, है और संभवतः रहेगा भी। फिर कहां कांग्रेस हार रही है।

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 भाजपा की विजय यात्रा कम, विपक्ष की पराजय यात्रा अधिक

इसके जवाब के लिए भी एक बार भाजपा की ओर देखने की जरूरत है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि भाजपा आज विकल्प के अभाव में आगे बढ़ रही है। बिहार में अगर विपक्ष एक होता तो तेजस्वी नजदीकी मुकाबला नहीं हारते। उत्तर प्रदेश में अपने प्रयत्नों से भाजपा मायावती को सरेंडर करवा कर मुकाबले को समाजवादी बनाम भाजपा न बनवाती तो उसके लिए सत्ता में आना नामुमकिन था। महाराष्ट्र में आज भी भाजपा इसलिए सफल नहीं हो पाई क्योंकि वहां शरद पवार जैसे क्षेत्रीय क्षत्रप का हाथ उद्धव ठाकरे और कांग्रेस की महागठबंधन सरकार पर है, वरना भाजपा के चाणक्य को सत्ता हथियाने में समय न लगता। इन उदाहरणों से साफ है कि भाजपा की विजय यात्रा उसकी कम है और विपक्ष की पराजय यात्रा अधिक। महाराष्ट्र जैसे राज्य में जिसे बाद ठाकरे ने भगवा रंग में रंग दिया था, यह नहीं कहा जा सकता कि हिंदू जागरूक नहीं है, या बहुसंख्यक नहीं है। फिर भी भाजपा का सत्ता से दूर रहना अपने आप में भाजपा की नीतियों पर सवाल उठाता है। वास्तव में भाजपा सफल नहीं हैं जहां विपक्ष नहीं है। कांग्रेस इन उदाहरणों से कहां और कैसे बावस्तां है, आईये, इस पर गौर करते हैं।

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योग्यता और सम्भावनाओं के आधार पर देनी होगी जिम्मेदारी

कांग्रेस आज एक भटकी हुई पार्टी लगती है जिसके पास न तो कोई नीति है और न नेतृत्व। कांग्रेस कभी साफ्ट हिंदुत्व की राह पर चलती है तो कभी पुरानी परिपाटी पर। एक ही दिन में एक ही समय, पार्टी के दो बड़े नेताओं में एक प्रियंका काशी में शिवलिंग पूज कर साफ्ट हिंदुत्व का संदेश देती है तो उसी समय राहुल गांधी केरल में हिंदुत्व की जड़ पर ही सवाल उठा देते हैं। आज सोशल मीडिया के दौर में कोई खबर तत्काल वायरल होती है। नहीं भी होती है तो भाजपा की आईटी सेल इसे वायरल करने के लिए कटिबद्ध है। कांग्रेस की पराजय का दूसरा कारण है कि उसे तत्काल असुरक्षा के माहौल से बाहर निकलना होगा। यह सर्वविदित है कि जब तक गांधी परिवार नहीं चाहेगा, कांग्रेस का नेतृत्व वही करेगा। कांग्रेस को जी 23 सहित हर असंतुष्ट नेता की बात एक प्लेटफार्म पर बैठकर सुननी भी होगी और उन्हें उनकी योग्यता और संभावनाओं के आधार पर जिम्मेदारियां देनी ही होंगी। अकेले राहुल और प्रियंका के दम पर कांग्रेस का पुनरोद्धार होना अब असंभव है।

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तीसरा और सबसे बड़ा कारण, कांग्रेस को अब भूतकाल की परछाइयों से बाहर निकलना होगा। दिग्विजय सिंह और ऐसे ही दूसरे नेता कांग्रेस की जड़ों में दीमक की तरह लगे हैं, उनसे मुक्त होना होगा। वे न सिर्फ नेतृत्व को गुमराह कर रहे हैं वरन, निजी स्वार्थों के लिए पार्टी को दांव पर लगा रहे हैं। चौथा और अहम कदम, पार्टी को विपक्षी दलों का भरोसा जीतना होगा। आज भी अखिलेश और ममता बनर्जी जैसे चंद नेताओं को छोड़ विपक्ष के लिए कांग्रेस सर्वग्राह्य है। फिर चाहे वह पवार हों, ठाकरे हों, तेजस्वी हों या फिर विपक्षी एका की नये सिरे से मुहिम चलाने वाले चंद्रशेखर राव हों। सब जानते हैं कि बगैर कांग्रेस कोई भी मुहिम राष्ट्रीय परिदृश्य पर सफल नहीं होगी।

सच तो यह है कि कांग्रेस खुद अपनी दुश्मन आप है। फिल्म शोले में गब्बर सिंह का एक संवाद था- गब्बर को सिर्फ एक आदमी हरा सकता है, सिर्फ एक आदमी… खुद गब्बर…। कांग्रेस की वर्तमान स्थिति पर यह संवाद आज पूरी तरह खरा उतरता है।

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