Wednesday, December 8, 2021

किसान आंदोलन, जनता से बहिष्कार, नेताओं की घेरेबंदी और वोट के डर से बैकफुट पर आयी BJP, ऐसी रही रणनीति

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दिल्ली /लखनऊ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया है। इस ऐलान के साथ ही कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों को बड़ी कामयाबी मिली है। यह वही कृषि कानून हैं जिसको लेकर सरकार का दावा था कि ये कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए लाए गए हैं। केन्द्र सरकार के लाये कृषि कानून का किसान संगठन काले कानून बताकर एक साल से आंदोलन कर रहे हैं। दिल्ली बार्डर के साथ ही देश में लगातार आंदोलन चल रहा था। पीएम मोदी के कृषि कानून वापस लेने के ऐलान के बाद किसान संगठनों ने अपनी जीत बताया है। मोदी सरकार को बैकफुट पर लाना किसान संगठनों के लिए कठिन था। किसानों ने पहले बॉर्डर पर डेरा डाला। फिर इस रणनीति को सड़कों तक पहुंचाया। नेताओं का घेराव किया और आखिर में किसान नेताओं ने भाजपा को वोट से चोट देने की तैयारी कर दी।

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दिल्ली की सीमाओं पर डाला डेरा

सितंबर में केंद्र सरकार तीन कृषि कानून व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020 , मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक सशक्तिकरण एवं संरक्षण अनुबंध विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन बिल- 1955 लाई थी। इन कृषि कानूनों के विरोध में नवंबर 2020 से किसान संगठन सड़कों पर थे। आंदोलन को कई बार बदनाम करने की कोशिश हुई लेकिन किसान संगठन अपनी दृढ़ता पर कायम रहे। किसानों ने दिल्ली के सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर डेरा डाले रहे। किसान अपने साथ राशन पानी भी लेकर आये। किसानों ने ऐलान किया कि जब तक सरकार कानून वापस नहीं लेगी तक तक वह दिल्ली के बॉर्डर पर डटे रहेंगे। किसानों ने दावा किया कि उनके पास सालों तक आंदोलन करने के लिए राशन पानी की व्यवस्था है। किसानों के आंदोलन की यह तैयारी कामयाब रही।

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सोशल मीडिया पर खोला मोर्चा

दिल्ली के घेराव से शुरू हुए इस आंदोलन में सोशल मीडिया ने भी अहम भूमिका निभाई। किसान संगठन के नेता ट्विटर, फेसबुक समेत अन्य सोशल मीडिया माध्यमों पर काफी सक्रिय रहे। किसान नेता राकेश टिकैत आंदोलन से लोगों को जोड़ने के लिए ट्विटर पर काफी सक्रिय रहे। किसानों की गतिविधि आंदोलन को धार देते रहे। इस दौरान मुख्यधारा की मीडिया किसानों के पक्ष को सही तरीके से पेश नहीं कर रही थी। संगठन के सोशल मीडिया पेज पर भी आंदोलन के बारे में लगातार जानकारी दी गई। महापंचायतों का लाइव टेलीकास्ट किया गया। किसानों के आंदोलन को सोशल मीडिया ने बहुआयामी बना दिया।

जब 26 जनवरी को बैकफुट पर थे किसान

किसानों ने 26 जनवरी के दिन ट्रैक्टर परेड निकाली थी। इस दौरान हिंसा हुई जिससे किसानों के उपर गंभीर आरोप लगे। लाल किले पर भी जमकर उपद्रव हुआ। हिंसा के बाद आंदोलन लगभग खत्म होने की कगार पर था। 29 जनवरी को राकेश टिकैत के ‘आंसू‘ रंग लाए और उनकी मार्मिक अपील ने आंदोलन को फिर खड़ा कर दिया। टिकैत के आंसुओं ने न सिर्फ आंदोलन को खत्म होने से बचाया, बल्कि उन्हें भी किसान आंदोलन का बड़ा चेहरा बना दिया। वर्तमान में किसान एकजूट हैं।

भाजपा नेताओं की गांव में नो एंट्री

हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा असर दिखा। यहां किसान धर्म, जाति को छोड़ कर एक मंच पर आ गये। पंजाब और उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं। पंजाब के कई गांवों में भाजपा नेताओं की एंट्री पर रोक लगा दी गई। यहां तक की पंजाब में मुक्तसर जिले के मलोट में कृषि कानूनों के समर्थन में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने पहुंचे भाजपा विधायक अरुण नारंग को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। हरियाणा और पंजाब के तमाम गांवों में भाजपा-जेजेपी नेताओं की एंट्री पर बैन लगा दिया गया। उत्तर प्रदेश के अमरोहा में भी कई गांव में भाजपा के नेताओं की एंट्री पर बैन संबंधी बोर्ड लगाए गये। विधानसभा चुनाव में पिछड़ती भाजपा, बहिष्कार से बैकफूट पर आ गयी।

नेताओं की घेराबंदी हुई

हरियाणा में किसानों ने नेताओं की घेराबंदी की। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और डिप्टी सीएम दुष्यंत चैटाला के कार्यक्रमों के दौरान भी किसानों ने जमकर हंगामा किया। करनाल में तो खट्टर के कार्यक्रम में पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। हरियाणा के रोहतक के किलोई गांव में एक मंदिर में पूर्व मंत्री समेत तमाम भाजपा नेताओं को किसानों ने बंधक बना लिया था। कई घंटों बाद पुलिस ने भाजपा नेताओं को छुड़वाया था। किसानों का आंदोलन कई प्रांत में लगातार चलने से भाजपा सरकारों के भीतर भी विरोध होने लगे थे।

वोट से चोट का ऐलान

राकेश टिकैत ने चुनाव में वोट से चोट देने का ऐलान किया था। सियासी दल जनता के विरोध और मतदाताओं की चोट से पीछे हट जाते हैं। भाजपा ने ऐसा ही किया। राकेश टिकैत ने साफ कर दिया था कि वे किसी नेता के साथ मंच साझा नहीं करेंगे। टिकैत पश्चिम बंगाल में भाजपा के खिलाफ प्रचार करने पहुंचे थे। टिकैत ने यूपी, एमपी, राजस्थान और हरियाणा में कई जगह महापंचायत की. हरियाणा में एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा को हार का भी सामना करना पड़ा। ऐसे में भाजपा के सामने किसान आंदोलन रणनीति के साथ मजबूती से खड़ा रहा।

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