Friday, December 3, 2021

मंदिर को बचाने के लिए कोर्ट पहुंचे मुस्लिम परिवारों के लोग, ऐसे जीती कानूनी जंग

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नई दिल्‍ली। राजधानी दिल्ली के जामिया नगर (Jamia Nagar) के कुछ मुस्लिम परिवारों ने हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल पेश की है। यहां के मुस्लिमों (Muslims Save Temple) ने नूर नगर स्थित एक मंदिर को बचने के लिए दिल्‍ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में कानूनी लड़ाई लड़ी है। असल में, कुछ वक्त पहले जमीन पर कब्‍जा करने के मंसूबे से मंदिर की देखरेख करने वाले ने धर्मशाला के एक हिस्से को तोड़ दिया था। जबकि जामिया नगर वार्ड 206 कमेटी के अध्यक्ष सैयद फौजुल अजीम (अर्शी) की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्‍ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने कहा कि ले-आउट प्लान के हिसाब से उस जगह पर मंदिर है और इस पर अतिक्रमण करने की इजाजत नहीं है।

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साथ ही दिल्‍ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार, पुलिस आयुक्त , साउथ एमसीडी और जामिया नगर के थाना प्रभारी को आदेश दिया,’ वे सुनिश्चित करें कि भविष्य में मंदिर परिसर में कोई अतिक्रमण नहीं कर पाएगा। वहीं, कानून-व्यवस्था की भी कोई दिक्कत नहीं होगी। वहीं, दिल्‍ली पुलिस और साउथ एमसीडी ने अदालत को मंदिर पर किसी भी तरह का अतिक्रमण नहीं होने देने का विश्वास दिलाया है।

ये है मामला

इस केस में सैयद फौजुल अजीम (अर्शी) के अधिवक्ता नितिन सलूजा की ओर से अदालत में कहा गया कि मंदिर की धर्मशाला को रातों-रात गिरा कर जमीन को बराबर कर दिया गया, जिससे बिल्डरों द्वारा इस पर कब्जा किया जा सके। साथ ही धर्मशाला को तोड़ने से जुड़ी फोटोज को भी पेश किया गया है। वहीं, दिल्ली सरकार के शहरी विकास की वेबसाइट पर उपलब्ध ले-आउट प्लान का भी हवाला दिया, जिसमें नूर नगर एक्सटेंशन जामिया नगर में उस जगह पर मंदिर है।

वहीं, सैयद फौजुल अजीम (अर्शी) की ने जो याचिका दायर की है उसमें कहा गया था कि जामिया नगर के नूर नगर स्थित मंदिर की धर्मशाला की जमीन माखन लाल के पुत्र जौहरी लाल की थी। इस मंदिर को 1970 में माखन लाल ने बनवाया था। मुस्लिम बाहुल क्षेत्र होने के बाद भी यहां 50 साल से लोग पूजा करने आते थे। इस इलाके में केवल 40 से 50 हिंदू परिवार ही रहते हैं। मंदिर की देखरेख करने वाले ने पहले धर्मशाला और फिर मंदिर को भी गिरा दिया, जिससे वह काम्प्लेक्स बना सके। इसी साल अर्शी ने 20 सितंबर को पुलिस और साउथ एमसीडी को भी शिकायत की थी, मगर जब वहां से कार्रवाई सहायता नहीं मिली तो हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

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