Saturday, January 16, 2021

औरंगजेब, शाहजहां ने मंदिरों का मरम्मत कराया के दावे का साक्ष्य नहीं दे सका—

दिल्ली। पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में अपूष्ट जानकारी होने पर विद्यार्थी और समाज गुमराह होंगे। इतिहास की गलत जानकारी से विवाद पैदा होगा। ऐसा ही एक मामला 12वीं के इतिहास की पुस्तक में मिला है। क्या पाठ्य पुस्तकों में मुगलकाल को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है? क्या हिंदू राजाओं के कालखंड को कम आंका गया है? इस तरह के सवाल देश के बौद्धिक वर्ग के बीच अक्सर उठते रहते हैं। हाल ही में इसको लेकर शिवांक वर्मा नाम के एक छात्र ने सूचना के अधिकार के तहत राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद से इसी से संबंधित कुछ सवाल पूछे हैं। एनसीईआरटी ने इसको लेकर जो जवाब दिया है। वह सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। स्पष्ट जवाब नहीं देने की स्थिति में एनसीईआरटी पर सवाल उठने लगे हैं। शिवांक वर्मा ने आरटीआई के जरिए एनसीईआरटी से दो सवाल पूछे थे। उनका पहला सवाल था कि बारहवीं की कक्षा में पढ़ाए जाने वाली किताब थीम्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री पार्ट-2 में दावा किया गया है कि शाहजहां और औरंगजेब के शासनकाल में युद्ध के दौरान जब मंदिर टूटे तो उनकी मरम्मत के लिए भी धन दिए गए। इसका स्रोत क्या है? दूसरा यह भी बताएं कि औरंगजेब और शाहजहां ने कितने मंदिरों की मरम्मत करवाए? इस सवाल के जवाब में एनसीईआरटी की ओर से कह दिया गया कि विभाग के पास मांगी गई जानकारी के संबंध में फाइल में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है।

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शिवांक वर्मा ने बताया कि पिछले साल सितंबर या अक्टूबर में एनसीईआरटी से आरटीआई के जरिए सवाल पूछा था। 12वीं की इतिहास की किताब में किए गए इस दावे का क्या आधार है कि युद्ध में मंदिरों के टूटने पर भी शाहजाहां और औरंगजेब ने इनकी मरम्मत के लिए धन जारी किए थे। ऐसे कितने मंदिर हैं जिनकी मरम्मत शाहजहां और औरंगजेब ने करवाई थी। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी रायपुर के छात्र शिवांक ने कहा कि 18 नवंबर को एनसीईआरटी ने जवाब दिया था कि पाठ्यपुस्तक में किए गए इन दावों का उसकी फाइल में कोई रिकॉर्ड नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2018 में 12वीं क्लास में पढ़ते समय ही इन दावों के लेकर मन में सवाल उठा था और इसलिए मैंने आरटीआई दायर करके इस बारे में पूछा था। टेक्स्ट बुक्स में सुधारों के मुद्दे पर शिक्षा पर संसद की स्थायी समिति की मीटिंग में भी बुधवार को भारतीय इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में मुगलकाल का मुद्दा छाया रहा।

स्थायी समिति की मीटिंग के एजेंडे में पाठ्यक्रम की किताबों से गैर-ऐतिहासिक तथ्यों की समीक्षा करना था। बुधवार को पैनल ने एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर जगमोहन सिंह राजपूत और शंकर शरण का पक्ष सुना। भारतीय शिक्षा मंडल और शिक्षा संस्कृति न्यास से जुड़े दोनों शिक्षाविदों ने पैनल से कहा कि मुगलकाल और हिंदू राजाओं के कालखंड को किताब में मिली जगह में संतुलन की जरूरत है।

मुगलकाल के तथ्यों को सही संदर्भों में पेश करने की जरूरत है। आक्रमणकारी के रूप में इनकी भूमिका पर पाठ्यपुस्तकों में कुछ भी नहीं है। बताया जा रहा है कि इन दोनों ने यह भी कहा कि बच्चों को वैदिक काल और उसके बाद के कालखंड की भारतीय संस्कृति के बारे में बताने और हमारी पाठ्य पुस्तकों पर से वामपंथी इतिहासकारों के प्रभाव को तथ्यों के आईने में सही करने की जरूरत है। ज्ञात हो कि देर से ही सही स्पश्ट और वास्तविक तथ्य विद्यार्थियों को मिलेंगे।

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