काबुल। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद सबसे बड़ा खतरा महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों के लिए है। अफगानिस्तान के तखर और बदख्शां प्रांत से ऐसी भी खबरें हैं कि तालिबान जवान लड़कियों से जबरदस्ती अपने लड़ाकों की शादी करा रहे हैं। डॉ. सलीम जावेद पेशे से डॉक्टर हैं और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। वह स्वीडन में रहते हैं और लम्बे समय से हजारा मुद्दों पर लिखते रहे हैं। डॉ. जावेद कहते हैं कि मजारी की मूर्ति का सिर काटकर जमीन पर रख दिया गया ताकि बिहेडिंग का सीन बन सके। हजारा लोगों ने इसका प्रोटेस्ट भी किया है, लेकिन तालिबान ने उनसे कहा है कि यह किसी अराजक तत्व का काम है।

डॉ. जावेद कहते हैं, ‘लड़कियों को जबरदस्ती उठाकर निकाह करने की रिपोर्टों की हम पुष्टि नहीं कर सके हैं, लेकिन उत्तरी अफगानिस्तान के एक दूरस्थ इलाके में तालिबान के एक कमांडर ने बुजुर्गों से कहा कि वो विधवा और शादी की उम्र लायक लड़कियों की लिस्ट सौंपे, उनका निकाह मुजाहिदों से कराया जाएगा। इसकी पुष्टि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने की है। डॉ. जावेद कहते हैं कि मेरे पास कंफर्म्ड रिपोर्ट है कि हजारा बहुल इलाकों से लोगों ने तालिबान के आने की आहट पर ही अपनी जवान लड़कियों को काबुल भेज दिया था, लेकिन अब उन्हें ये डर है कि वो कब तक काबुल में रहेंगी और वहां भी कब तक सुरक्षित हैं।

मानवाधिकार कार्यकर्ता दावा करते हैं कि तालिबान ने हजारा बहुल जिलों में लोगों का कत्ल-ए-आम किया है, जिसकी वजह से हजारा आबादी दहशत में हैं। इसी मुद्दे पर डॉ. गिजाबी कहते हैं कि तखार प्रांत में तालिबान ने हर परिवार को तालिबान से शादी करने के लिए एक लड़की देने के लिए कहा है। भले ही काबुल में अभी वो ऐसा न कर रहे हैं, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में तो कर ही रहे हैं।

तालिबान या तो इन लड़कियों से शादी करेंगे या इन्हें अपने साथी आतंकवादियों को तोहफे के तौर पर सौंप देंगे। पहले भी वो लड़कियों को छीनकर आपस में बांट चुके हैं। वे कहते हैं कि यह एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। यदि तालिबान ने रेप किया भी होगा तो इसकी पुष्टि करना बेहद मुश्किल होगा, क्योंकि पीड़ित इस बारे में मुंह नहीं खोलती हैं। अफगानिस्तान के समाज में इसे बेहद शर्मनाक माना जाता है। तालिबान के लड़ाके ये जानते हैं कि यदि वे रेप या गैंगरेप करते भी हैं तो पीड़ित कभी अपना मुंह नहीं खोलेंगी, लेकिन मैं ये मानता हूं कि तालिबान ने जैसे 1998 में रेप किए थे, वे ऐसा कर रहे होंगे।

अफगान नस्ल से अलग दिखते हैं हजारा

करीब 40 लाख हजारा अफगानिस्तान में रहते हैं। ये देश की आबादी का दस प्रतिशत हैं, लेकिन सत्ता में इनका प्रतिनिधित्व न के बराबर हैं। तालिबान में हजारा बिलकुल भी नहीं हैं। हजारा लोग अफगान नस्ल से अलग दिखते हैं और एशियाई अधिक लगते हैं। अफगानिस्तान के जिस मध्य-पहाड़ी इलाके में ये लोग रहते हैं उसे हजारिस्तान कहा जाता है। इसमें प्रमुख प्रांत हैं बामियान, देयकुंदी, गोर, गजनी, उरूजगान, परवान, मैदान वारदाक। इसके अलावा बदख्शा प्रांत में भी इनकी ठीकठाक आबादी है।

अकरम गिजाबी वर्ल्ड हजारा काउंसिल के चेयरमैन हैं। वे कहते हैं कि तालिबान कुछ भी क्यों न दावा करे, लेकिन उसकी बातों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। हजारा पर लम्बे समय से आतंकवादी हमले होते रहे हैं। अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट इन खोरेस्तान प्रोविंस ने ही बीते कुछ सालों में तीस बड़े हमले हजारा पर किए हैं। उनके स्कूलों, मस्जिदों, बाजारों को निशाना बनाया जाता रहा है। अकरम गिजाबी कहते हैं कि इस समय हजारा की स्थिति बहुत बुरी है। उनके नेता देश के बाहर हैं। जो देश के भीतर हैं भी उन्होंने हजारा लोगों के लिए बहुत कुछ नहीं किया है। जो हजारा सरकार में शामिल भी थे वो भी बस नाम के लिए है। मुझे पता चला है कि हजारा लड़ाके पहाड़ों में छिप गए हैं। हजारा लोग इस समय बिलकुल बेसहारा हैं।

हजारा के अलावा उज्बेक और ताजिक लोगों की स्थिति भी अफगानिस्तान में बहुत अच्छी नहीं है। ताजिक मूल के नेता अमरुल्ला सालेह ने तालिबान के खिलाफ विद्रोह करके खुद को कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित कर दिया है, लेकिन हजारा से अभी कोई विरोध की आवाज नहीं उठी है। गिजाबी कहते हैं कि हम देख रहे हैं कि क्या तालिबान के खिलाफ कुछ विरोध खड़ा हो पाता है या नहीं, लेकिन अभी स्थित बहुत नाजुक है। हम बस स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।

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