afghan leader

काबुल /दिल्ली। अफगानिस्तान पर तालिबान का पूरी तरह से कब्जा हो गया है और राष्ट्रपति अशरफ गनी ने देश छोड़ दिया। इसके साथ ही सरकार से जुड़े कई नेता और अधिकारियों के बारे में भी देश छोड़ने की बातें कही जा रही हैं। अमेरिकी सेना की वापसी के बाद से ही तालिबान ने ढूंढ-ढूंढकर अपने विरोधियों को या तो मार दिया है या तो नजरबंद कर रखा है। अफगानिस्तान को तालिबान से बचाने के दौरान कुछ लोगों को ‘वॉरलॉर्ड्स‘ कहा जाता है और जो तालिबान के खुलकर लड़ाई लड़ते रहे हैं। उन्हें तालिबान अब तक पकड़ नहीं सका है। सिर्फ इस्माइल खान ही ऐसे हैं जिन्हें तालिबान पकड़ पाया है।

अब्दुल रशीद दोस्तम
67 साल के अब्दुल रशीद दोस्तम अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति भी रह चुके हैं। वो 2014 से 2020 तक इस पद पर रहे हैं। 9-11 के हमले के बाद अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार को गिराने में दोस्तम ने अमेरिकी सेना की काफी मदद की थी। दोस्तम का अफगानिस्तान के उत्तरी इलाकों में दबदबा है वहां की जनता उन्हें बहुत प्यार देती है। उन्हें मजार-ए-शरीफ का ‘बूढ़ा शेर‘ भी कहा जाता है। माना जा रहा है कि वह उज्बेकिस्तान में हो सकते हैं।

अता मोहम्मद नूर
1979 में जब सोवियत रूस ने अफगानिस्तान पर हमला किया तो अता मोहम्मद नूर ने रूसी सेना के खिलाफ लोगों को तैयार किया। सोवियत के खिलाफ बने जमीयत-ए-इस्लामी के कमांडर बने। जब 1996 में तालिबान ने सत्ता संभाली तो उन्होंने अहमद शाह मसूद के साथ मिलकर तालिबान के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा तैयार किया था। अता मोहम्मद नूर 2004 से जनवरी 2018 तक बल्ख प्रांत के गवर्नर रहे हैं। तालिबान के कब्जे के बाद से वह गायब हैं। उनके बारे में भी कहा जा रहा है कि ताजिकिस्तान के इलाके में चले गए हैं।

अहमद मसूद
अहमद मसूद एंटी तालिबान नेता अहमद शाह मसूद के बेटे हैं। अहमद शाह मसूद ने 1980 के दशक में सोवियत रूस की सेना का डटकर मुकाबला किया था। तालिबान का राज शुरू हुआ तो उसके खिलाफ भी मोर्चा संभाला। शाह मसूद को ‘पंजशीर का शेर‘ कहा जाता था। उनके रहते पंजशीर पर कोई कब्जा नहीं कर पाया। अब यहां की कमान उनके बेटे अहमद मसूद संभाल रहे हैं। तालिबान अभी तक पंजशीर तक नहीं पहुंच सका है।

अमरुल्ला सालेह
अमरुल्ला सालेह अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति हैं। अमरुल्ला सालेह पंजशीर में ही हैं। पंजशीर के नेता अहमद मसूद के साथ मीटिंग की एक तस्वीर भी शेयर हुई है, जिसके बाद माना जा रहा है कि सालेह और मसूद तालिबान से निपटने की रणनीति तैयार कर रहे हैं।

सलीमा मजारी
सलीमा का जन्म 1980 में ईरान में एक रिफ्यूजी के तौर पर हुआ था। उनकी पढ़ाई-लिखाई वहीं पर हुईं। बाद में सलीमा अफगानिस्तान आ गईं. सलीमा बल्ख प्रांत के चारकिंट जिली के गवर्नर भी रहीं है। सलीमा और तालिबान को नही पसन्द करती हैं़। तालिबान से निपटने के लिए उन्होंने अपनी फौज तैयार कर रखी है। सलीमा ईरान पहुंच गई हैं और वहीं से अपनी फौज को ऑपरेट कर रहीं हैं।

इस्माइल खान
इस्माइल खान को ‘हेरात का शेर‘ कहा जाता है। वह हेरात के गवर्नर रहे हैं। पिछले कई दिनों से वो तालिबान के खिलाफ लड़ रहे थे लेकिन तालिबान ने उन्हें पकड़ लिया। तालिबान ने उन्हें घर पर नजरबंद कर दिया हैै। इस्माइल खान को भारत का अच्छा दोस्त भी माना जाता है।

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