नई दिल्ली। विदेशी सैनिक अभी अफगानिस्तान पूरी तरह से छोड़ नहीं पाये थे कि तालिबान का कब्जा हो गया। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद हजारों अफगानी यहां से भागना चाहते हैं। तालिबान भले ही यह कहता रहे कि वह लोगों की रक्षा करेगा और किसी को परेशानी नहीं होने देगा, लेकिन हकीकत तो यही है कि तालिबान का दमनकारी शासन शुरू हो गया है। तालिबान के काबुल पर कब्जा करते ही अफगानिस्तान 20 साल पीछे पहुंच गया है। महिलाओं को बुर्के में रहने का आदेश दिया गया है। कामकाज छोड़कर घर संभालने की नसीहत भी दी गई है।

पुरुषों को कहा गया है कि पांचों वक्त की नमाज पढ़नी है और दाढ़ी नहीं कटवानी है। लड़कियों और बच्चियों की जिंदगी पर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में लोग किसी भी तरह अफगानिस्तान से भागना चाहते हैं। वहीं अफगानिस्तान जल्द से जल्द छोड़ना चाहते हैं लोग और काबुल एयरपोर्ट पर हजारों की संख्या में लोग विमानों में जगह मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

तालिबान के डर से अफगानी किसी भी तरह देश छोड़कर भागना चाहते हैं। उसके लिए जान की बाजी लगाने को भी तैयार हैं। विमान अपनी क्षमता से कहीं अधिक लोगों को लेकर जा रहे हैं। मालूम हो कि बीते सोमवार को एक प्लेन के उड़ान भरते ही उसके ऊपर चढ़े हुए तीन लोगों नीचे गिरकर मौत हो गयी।

अफगानिस्तान से बाहर निकलने के लिए लोग काबुल एयरपोर्ट पर लाइन में लगे हुए हैं। ऐसे में अफगानिस्तान सरकार का समर्थक भारत अब अफगानिस्तान में खुद को फंसा हुआ देखा रहा है। भारत ने कहा है काबुल का दूतावास बंद कर दिया जाएगा। दूतावास के कर्मचारियों के साथ ही अफगानिस्तान में रह रहे भारतीयों को भारत वापस लाया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि अफगानिस्तान पर तालिबान पर कब्जे के बाद भारत क्या करे? भारत का अफगानिस्तान में क्या भविष्य है? क्या भारत तालिबान सरकार को मान्यता देकर उनके साथ काम करेगा? इन सवालों के जवाब आसान नहीं है।

क्या फैसला लेगा भारत

डिफेंस एनालिस्ट, इंटरनेशनल रिलेशंस एक्सपर्ट्स व जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के पास भी इसका कोई साफ सीधा जवाब नहीं है, फिर भी एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत के पास मुख्य तौर पर दो रास्ते हैं। पहला तो यह कि तालिबान के आने के बाद भारत अफगानिस्तान से निकल जाये। ऐसा होने से ये होगा कि भारत द्वारा अफगानिस्तान में किए गए दशकों के काम कुछ ही दिनों में खत्म हो सकते हैं।

दूसरा विकल्प यह कि भारत तालिबान से बात करे तो उसके साथ डील करते हुए काम करे, लेकिन यह मुश्किल भरा है क्योंकि भारत सरकार अब तक अफगानिस्तान सरकार का समर्थन करती आई है और अफगानिस्तान सरकार को ही अफगानों का प्रतिनिधि मानती रही है।

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