Xi Jinping

दिल्ली। अफगानिस्तान में बिगड़े हालात और तालिबान की वापसी के साथ चीन ने अमेरिका को धमकी दी है। तालिबान का उदाहरण देते हुए चीन ने कहा है कि जब अमेरिका अफगानिस्तान में कुछ नही कर पाया तो ताइवान में क्या करेगा। चीन ने कहा है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के कारण काबुल सरकार का पतन हो गया। दुनिया ने देखा कि तालिबान लड़ाके कैसे काबुल में राष्ट्रपति भवन में दाखिल हो गाये। अमेरिका को अपने राजनयिकों को हेलीकॉप्टर से निकालना पड़ा और इससे अमेरिका की विश्वसनीयता को भारी झटका लगा है। चीन ने वियतनाम और सीरिया युद्ध का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका स्थिति बिगड़ने पर भाग निकलता है। ‘ग्लोबल टाइम्स‘ ने अफगानिस्तान संकट को लेकर मंगलवार को प्रकाशित संपादकीय में अमेरिका को अविश्वसनीय करार दिया है। तालिबान की मुहिम की तर्ज पर ताइवान को चीन में मिलाने की वकालत की है। अफगानिस्तान का भू-राजनीतिक मूल्य ताइवान से कम नहीं है। अफगानिस्तान के आसपास, अमेरिका के तीन सबसे बड़े भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं चीन, रूस और ईरान। अफगानिस्तान अमेरिका विरोधी विचारधारा का गढ़ है।

ग्लोबल टाइम्स ने कहा कि एक बार जब एक क्रॉस-स्ट्रेट्स युद्ध छिड़ जाएगा तो मेन लैंड (चीन) ताइवान पर कब्जा कर लेगा। अगर अमेरिका ताइवाइन में हस्तक्षेप के बारे में सोचता है तो उसे अफगानिस्तान, सीरिया और वियतनाम की तुलना में बहुत अधिक दम लगाना पड़ेगा। अमेरिका का सैन्य हस्तक्षेप ताइवान स्ट्रेट में यथास्थिति को बदलने के लिए एक कदम होगा और इससे वॉशिंगटन को फायदा होने के बजाय उसे एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

चीन के अखबार ने चेतावनी भरे लहजे में लिखा है कि अमेरिका को जो कीमत चुकानी पड़ेगी उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। एक विश्लेषक थॉर्स्टन बेनेर ने कहा कि यह नहीं बोल रहा कि अफगानिस्तान में अमेरिका जिस तरीके से पीछे हटा है, उससे अफगानों को दुख नहीं हुआ है। उन्हें कष्ट नहीं झेलना पड़ रहा है। लेकिन मैं ये नहीं मानता कि इससे अमेरिका और अमेरिका के गठबंधन बीजिंग के मुकाबले कमजोर दिखते हैं।

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