इन कंपनियों ने कर दिखाया अपना कमाल, वैक्सीन पर वैज्ञानिकों को मिले बेहतर परिणाम

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दुनियाभर में कोरोना महामारी का दौर अपने चरम पर पहुंच चुका है, चीन के वुहान शहर से फैले इस कोरोना वायरस ने लोगों की जिंदगी जी से जंजाल बना दी है। लेकिन अभी भी वायरस का कहर कम होने का नाम नहीं ले रहा। पूरी दुनिया में कोरोना वायरस की वजह से देश की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचा है, जिसकी भरपाई करनें में भी साल छह साल का समय लग सकता है। बता दें कि कोरोना वायरस ने अब तक दो करोड़ से भी अधिक लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है, जबकि 7,92,000 लोग इस महामारी की वजह से अपनी जान गंवा चुके है। इतना ही नहीं कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या में प्रतिदिन लाखों की संख्या में इजाफा देखने को मिल रहा है, जिसको लेकर वैज्ञानिक और सरकारें चिंता में है। हालांकि राहत की बात यह है कि 1 करोड़ से अधिक लोगों को रिकवर करने में डॉक्टरों को सफलता हाथ लगी है, लेकिन रिकवर करना भी अब वैज्ञानिकों की परेशानी बन सकता है, चूंकि कोरोना वायरस रोजाना अपने लक्षण बदल रहा है, इसका संक्रमण लोगों की जान का दुश्मन बन बैठा है।

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वहीं इस महामारी से निपटने के लिए अधिकांश देशों में इसकी वैक्सीन के ट्रायल पर काम चल रहा है। इस बीच खबर आ रही है कि रूस के बाद अमेरिका कंपनी फाइजर और जर्मनी की कंपनी बायोएनटेक की ओर से तैयार की जा रही कोरोना की वैक्सीन पर वैज्ञानिकों को बेहतर परिणाम मिले हैं। डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना वैक्सीन की निर्माता कंपनियों ने कहा है कि दूसरी वैक्सीन के बेहतर परिणाम इसलिए मिले क्योंकि दूसरी वैक्सीन ने बेहतर इम्यून

रेस्पॉन्स पैदा किया है. इसकी वजह से वॉलेंटियर्स में साइड इफेक्ट के मामले घट गए। इससे पहले पिछले महीने ही फाइजर कंपनी ने कोरोना वैक्सीन का डाटा पब्लिश किया था, हालांकि उस समय इस वैक्सीन को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई थी, लेकिन हाल फिलहाल में हुए नए परीक्षण में वैक्सीन का कोई साइड इफेक्ट देखने को नहीं मिला है, यानि की ऑक्सफोर्ड की यह वैक्सीन पूरी तरह से कोरोना मरीजों पर काम कर रही है।

बता दें कि वैज्ञानिकों को ट्रायल के दौरान पता चला कि B1 वैक्सीन का इस्तेमाल 18 से 55 साल के उम्र के लोगों पर किया गया था, जिनमें 50 फीसदी लोगों में मध्यम साइड इफेक्ट देखे गए, वहीं इस वैक्सीन को 65 से 85 साल के लोगों को लगाया गया तो यहां 16.7 फीसदी लोगों में रिएक्शन देखने को मिला. लेकिन दूसरी वैक्सीन लगाने पर 18 से 55 साल के लोगों में साइड इफेक्ट के मामले घटकर 16.7 फीसदी हो गए और 65 से 85 साल के लोगों में साइड इफेक्ट नहीं देखा गया।

medRxiv.org पर प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक, कोरोना से ठीक होने वाले मरीजों के मुकाबले वैक्सीन लगाने वाले वॉलेंटियर्स में एंटीबॉडी का स्तर करीब पांच गुना (4.6X) तक अधिक पाया गया। फाइजर के वैक्सीन डेवलपमेंट के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट विलियम ग्रूबर ने कहा कि शरीर वैक्सीन को जितना अधिक बर्दाश्त करेगा, वैक्सीन की स्वीकार्यता उतनी अधिक बढ़ेगी।

हालांकि, विलियम ग्रूबर ने दोनों ही वैक्सीन BNT162b1 (B1) और BNT162b2 (B2) को बढ़िया कैंडिडेट बताया है, लेकिन उन्होंने कहा कि हम भाग्यशाली हैं कि B2 वैक्सीन अधिक संतुष्ट कर रही है क्योंकि इससे इम्यूनिटी भी अच्छी पैदा हो रही और इसके रिएक्शन भी कम हैं।

मालूम हो कि पूरी दुनिया ही इस समय कोरोना महामारी से प्रकोप से जूझ रही है, वहीं इस महामारी से निपटने के लिए कठोरतम प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन एक आंकड़ा यह भी कहता है कि कोरोना वायरस कोई मामूली वायरस दिखाई नहीं पड़ता है चूंकि जिस तरह से इसने पूरी दुनिया पर अपनी धाक जमा ली है, ये सामान्य वायरस तो नहीं है। बहरहाल

इस बीच कोरोना की वैक्सीन को लेकर वैज्ञानिकों की रिसर्च जोरों पर है, हाल ही में रूस ने कोरोना की वैक्सीन ईजाद करने का दावा किया था, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अभी भी हरी झंड़ी नहीं दिखाई है। वहीं इस बीच कोरोना वैक्सीन को लेकर अमेरिका और जर्मन भी काफी आगे है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार साल के अंत तक पूरी दुनिया को एक नया जीवनदान मिलने की कवायद है, उम्मीद है कि कोरोना की वैक्सीन से लोगों की जिंदगी फिर से पहले जैसी हो जाएगी।

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