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हंगामा है क्यूं बरपा बस तस्लीमा नसरीन ने ट्वीट ही तो किया है

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दिल्ली। कलाकार, लेखक, पेशेवर के लिए दुनिया का सारा आकाश अपना होता है। ऐसे लोगों से जब जरा सी सख्ती और सही टिप्पणी आती है तो बवाल मच जाता है। आंदोलनकारी, कट्टरवादी अपनी दुकान चलाने लगते हैं। बांग्लादेश मूल की उदारवादी लेखिका तस्लीमा नसरीन के साथ ऐसा ही होता है। उनके बयान, लेखों पर इस्लामी-वामपंथी वर्ग आसमान सिर पर उठा लेता है। तस्लीमा नसरीन ऐसे ही ‘विवादित‘ बयानों के कारण ही चर्चा के केंद्र में रहा करती हैं। तस्लीमा कट्टरपंथियों के निशाने पर तो रहती ही हैं और तथाकथित उदारवादी वामपंथी भी उन्हें कोसते रहते हैं। तसलीमा नसरीन ने इंग्लैंड के एक क्रिकेट खिलाड़ी को लेकर जो कहा उसे लेकर जबर्दस्त बवाल मच गया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि इंग्लैंड का यह ऑलराउंडर अगर क्रिकेट नहीं खेल रहा होता तो इसने आईएसआईस जॉइन कर लिया होता। इस पर इंग्लैंड के ही तेज गेंदबाज जोफ्रा आर्चर तस्लीमा की कड़ी निंदा की। विरोध को बढ़ते देख तस्लीमा ने यह ट्वीट हटा लिया और कहा कि वो तो मजाक कर रही थीं, लेकिन लोग हैं कि मजाक भी नहीं समझते। तस्लीमा नसरीन 1990 के दशक में दुनिया की नजरों में तब आईं जब उनके अपने देश बांग्लादेश में उनके खिलाफ ‘इस्लाम के अपमान‘ का आरोप लगा। तस्लीमा ने आत्मकथा में मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों और धार्मिक कट्टरता का जिक्र किया था। नाराज मौलानाओं ने फतवे पर फतवे जारी कर दिए। तस्लीमा की किताबों पर अदालतों से बैन लगने लगे। कट्टरपंथी उन्हें जान से मारने की तैयारी करने लगे। हालत ऐसी हुई कि उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा।

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लेखक-साहित्यकार भी नहीं हुए अपने
तस्लीमा को 1994 में मुस्लिम धर्मगुरुओं के निषाने पर थीं तो दूसरी तरफ सरकार के निशाने पर भी आ गईं। उनके खिलाफ गर्दन काटने का फतवा जारी किया गया तो सरकार ने गिरफ्तारी वॉरंट जारी कर दिया। यह सब 1993 में उनकी पुस्तक ‘लज्जा‘ प्रकाशित होने के कारण हुआ। तस्लीमा ने पश्चिमी देशों में शरण लेना शुरू किया। अमेरिका की ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के कार सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स पॉलिसी में एक फेलो के रूप में जॉइन किया। तस्लीमा की बायोग्राफी सीरीज की तीसरी बुक ने लेखकों-साहित्यकारों की दुनिया में भी उधम मचा दिया। बंगाली भाषा के एक अक्षर ‘का‘ शीर्षक से प्रकाशित एक पुस्तक में उन्होंने बांग्लादेशी राइटर सैयद शम्सुल हक की तरफ से जो दावा किया। उससे साहित्यिक जगत में उनकी कड़ी आलोचना हुई। बांग्लादेश, भारत के साहित्याकारों, लेखकों को टोली भी नाराज हो गयी। तस्लीमा ने अपनी पुस्तक में दावा किया कि लेखक सैयद शम्सुल हक ने अपनी साली के साथ यौन संबंध की बात कबूली थी।

तस्लीमा का इन विषयों पर रहा है ध्यान
तस्लीमा नसरीन खासकर इस्लाम और इसके अनुयायियों पर कड़ी नजर रखती हैं। तस्लीमा दुनिया से यहां तक अपील कर चुकी हैं कि इस्लाम का बहिष्कार किया जाए। उन्होंने 29 अक्टूबर, 2020 को ट्वीट कर लिखा कि बायकॉट इस्लाम । इस ट्वीट पर कांग्रेसी-वामपंथी रुझान के एक ऐक्टिविस्ट साकेत गोखले ने उनके खिलाफ मुकदमा कर दिया। गोखले ने इस ट्वीट को धार्मिक विद्वेश फैलाने वाला बताया। इससे कुछ दिन बाद तस्लीमा ने ट्वीट कर कहा था कि इस्लाम धर्म में सुधार की जरूरत है, नहीं तो आधुनिक सभ्यता में इस धर्म के लिए कोई जगह नहीं है। तस्लीमा कहती हैं कि इस्लाम शांति का धर्म है ही नहीं। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि इस्लाम को शांति का धर्म कहना छोड़ दिया जाना चाहिए। इस्लाम और आतंकवाद को लेकर उनके कई बयान विवादों के कारण बने।

तस्लीमा नसरीन तथाकथित वामपंथियों और उदारवादियों को इस्लामी दक्षिणपंथी के तौर पर देखती हैं। उनका मानना है कि आखिर जो वामपंथी और उदारवादी अभिव्यक्ति की आजादी का ढिंढोरा पीटते रहते हैं, वो इस्लाम का आलोचनात्मतक विश्लेषण बर्दाश्त नहीं कर पाते। महिलाओं के प्रति भी उनका नजरिया एकदम स्पश्ट है। वो महिलावादियों की भी यह कह कर खबर लेती हैं कि जो फेमिनिस्ट महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं, वो आखिर महिलाओं के दोयम दर्जे का मानने वाले इस्लाम और इसके रीति-रिवाजों का समर्थन कैसे कर सकते हैं? उन्होंने ट्वीट किया कि अगर आप इस्लाम को छोड़कर दूसरे धर्मों की आलोचना करते हैं तो आप प्रगतिशील, आजाद विचारक, उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, बौद्धिक, क्रांतिकारी कहलाते हैं। लेकिन जैसे ही इस्लाम को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने को कोशिश करते हैं, आप घृणित, डरावना, उबाऊ, धर्मांध और पैसे पर बिका हुआ इंसान हो जाते हैं।

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तस्लीमा का भारत से रिश्ता
तस्लीमा ने भारत को ही आखिरी ठिकाना बना लिया है। तस्लीमा भारतीय नागरिकता पाने की लगातार जद्दोजहद कर रही हैं। उन्हें स्वीडन की नागरिकता प्राप्त करने में उन्हें सफलता जरूर मिल गई है। तस्लीमा ज्यादातर वक्त भारत में ही बिताती हैं। 1990 के दशक में ही बांग्लादेश तस्लीमा नसरीन को भारतीय नागरिकता देने की हिम्मत यहां कोई भी सरकार नहीं जुटा पाई है। सरकारों को डर है कि तस्लीमा को स्वीकार करते ही करोड़ों मुसलमान और तथाकथित उदारवादी नाराज हो जाएंगे। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में पहली बार सरकार बनी तो कुछ महीने बाद ही तस्लीमा नसरीन ने भारत की नागरिकता के लिए फिर से आवेदन कर दिया। मोदी सरकार ने तस्लीमा का टेंपररी टूरिस्ट वीजा की अवधि तो दो महीने के लिए बढ़ा दी लेकिन उन्हें भारतीय नागरिकता देने से इनकार कर दिया।

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इससे पहले कांग्रेस के नेता प्रणब मुखर्जी ने बीजेपी के सवाल पर लोकसभा में ऐलान किया था कि उनकी सरकार तसलीमा नसरीन को भारत में आश्रय देती रहेगी। विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने तब कहा था कि भारत ने अपने पूरे इतिहास में ऐसे किसी शख्स को कभी आश्रय देने से इनकार नहीं किया है जो यहां आए और सुरक्षा चाही है। वर्तमान में तस्लीमा नसरीन नारीवादी, उदारवादी लेखन कर रही हैं।

यह है उनका जीवन
तसलीमा नसरीन की उपन्यास ‘लज्जा’ पर भारत में फिल्म भी बन चुकी है। इस फिल्म के बाद उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया गया था। तस्लीमा पेशे से एक डॉक्टर रही हैं लेकिन बाद में वे लेखिका बन गई। 25 अगस्त 1962 में बांग्लादेश के मयमनसिंह में पैदा हुईं तसलीमा ने बांग्लादेश से ही चिकित्सा में डिग्री ली है। तस्लीमा नारीवादी आंदोलन से भी जुड़ी हैं, और चाहती हैं कि भारत में हर क्षेत्र में महिलाओं की मजबूत भागीदारी हो। उन्होंने एक बार उन्होंने मशहूर बांग्ला लेखक सुनील गंगोपध्यान पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। इसलिए उन पर कई बार सस्ती लोकप्रयिता हासिल करने के भी आरोप लगते रहे हैं हालांकि वह गंभीर लेखिका हैं।

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ये है तस्लीमा नसरीन की रचनायें
लज्जा, दो औरतों के पत्र,मुझे घर ले चलो, दुखियारी लड़की, वे अंधेरे दिन, औरत के हक में, बेषर्म, निषिद्ध, औरत का कोई देष नहीं, फेरा, निमंत्रण, बंदिनी, रिवेंज, निर्वासन, उत्ताल हवा, मेरे बचपन के दिन, नश्ट लड़की नश्ट गद्य, नहीं कहीं कुछ भी नहीं, चार कन्या, मुझे देना और प्रेम, कुछ पल साथ रहो, मुझे मुक्ति दो, द्विखंडिता, कुछ गद्य कुछ पद्य, छोटे-छोटे दुख, तस्लीमा नसरीन की कवितायें, जल पद्य।

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