उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है। विधान परिषद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने बताया कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों में सबसे अधिक सुरक्षा अखिलेश यादव को मिली हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अखिलेश यादव की सुरक्षा में 186 सुरक्षाकर्मियों का नियतन है, जिनमें से 185 वर्तमान में तैनात हैं। खास बात यह है कि उनकी सुरक्षा में 24 कोबरा कमांडो भी शामिल हैं, जो उच्च स्तर की सुरक्षा का हिस्सा माने जाते हैं।
सुरक्षा से जुड़ा यह मुद्दा उस समय उठा जब समाजवादी पार्टी के सदस्य आशुतोष सिन्हा ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को दी जा रही सुरक्षा और एनएसजी सुरक्षा को लेकर सवाल पूछा। जवाब देते हुए मौर्य ने कहा कि राज्य सरकार सभी संवैधानिक पदों और पूर्व पदाधिकारियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार प्रदेश के हर व्यक्ति की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
किसे कितनी सुरक्षा? आंकड़ों से समझिए पूरा मामला
डिप्टी सीएम ने सदन में स्पष्ट आंकड़े रखते हुए बताया कि भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह की सुरक्षा में 81 सुरक्षाकर्मियों का नियतन है, जबकि वर्तमान में 82 कर्मी तैनात हैं। वहीं बसपा की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को 156 सुरक्षाकर्मियों का नियतन मिला है, लेकिन उनके पास 161 सुरक्षाकर्मी तैनात हैं।
इसके मुकाबले अखिलेश यादव को 186 सुरक्षाकर्मियों का नियतन दिया गया है और 185 वर्तमान में तैनात हैं। इसके अलावा उनकी सुरक्षा में 24 कोबरा कमांडो की मौजूदगी ने इस मुद्दे को और चर्चा में ला दिया है। सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा दी गई है।
मौर्य ने यह भी बताया कि एनएसजी सुरक्षा केवल मायावती के पास है। यह जानकारी सामने आते ही सदन में राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई। सुरक्षा व्यवस्था के आंकड़ों ने विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच नई बहस को जन्म दे दिया।
‘पूर्व मुख्यमंत्री हैं और रहेंगे’ बयान पर सियासी तंज
सदन में चर्चा के दौरान केशव प्रसाद मौर्य ने हल्के तंज के साथ कहा कि अखिलेश यादव पूर्व मुख्यमंत्री हैं और पूर्व मुख्यमंत्री ही रहेंगे। इस टिप्पणी पर समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। सपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र चौधरी ने दावा किया कि 15 मार्च 2027 को अखिलेश यादव दोबारा प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे।
यह बयान राजनीतिक माहौल को और गर्म कर गया। सुरक्षा से शुरू हुई चर्चा चुनावी भविष्यवाणियों तक पहुंच गई। सपा नेताओं ने इसे राजनीतिक कटाक्ष बताया, जबकि भाजपा की ओर से कहा गया कि यह सिर्फ तथ्यात्मक जानकारी थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में आने वाले चुनावों को देखते हुए ऐसे मुद्दे राजनीतिक धार देने का काम करते हैं। सुरक्षा व्यवस्था का मुद्दा सीधे तौर पर प्रशासनिक विषय है, लेकिन जब इसे सदन में उठाया जाता है तो उसका राजनीतिक असर भी देखने को मिलता है।
सुरक्षा बनाम राजनीति: सरकार का क्या है रुख?
उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि प्रदेश सरकार सुरक्षा व्यवस्था को लेकर किसी तरह की लापरवाही नहीं बरत रही है। उन्होंने कहा कि उपमुख्यमंत्रियों से लेकर आम नागरिक तक, सभी की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है।
अखिलेश यादव सुरक्षा को लेकर सामने आए आंकड़े यह दिखाते हैं कि उन्हें राज्य में सबसे मजबूत सुरक्षा कवच मिला हुआ है। 24 कोबरा कमांडो की तैनाती इस बात का संकेत है कि उनकी सुरक्षा को विशेष श्रेणी में रखा गया है।
हालांकि विपक्ष का कहना है कि सुरक्षा को राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। वहीं भाजपा का पक्ष है कि सदन में पूछे गए सवाल का जवाब तथ्यात्मक रूप से दिया गया है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सुरक्षा का मुद्दा नया नहीं है, लेकिन इस बार आंकड़ों के साथ सामने आई जानकारी ने चर्चा को और गहरा कर दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुद्दा केवल सदन तक सीमित रहता है या चुनावी मंचों तक भी पहुंचता है। फिलहाल इतना तय है कि अखिलेश यादव सुरक्षा को लेकर दी गई जानकारी ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
