Sunday, February 8, 2026
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‘घूसखोर पंडत’ फिल्म के पीछे कौन? अखिलेश यादव ने साधा BJP पर निशाना, बोले– समाज को बदनाम करने की साजिश उजागर

फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ विवाद में अखिलेश यादव की एंट्री के बाद सियासत तेज हो गई है। सपा प्रमुख ने बीजेपी पर समाज को अपमानित करने की साजिश का आरोप लगाया। जानिए उन्होंने क्या-क्या कहा और क्यों उठे सवाल।

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फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ रिलीज से पहले ही भारी विवादों में घिर गई है। फिल्म के नाम और कथित विषयवस्तु को लेकर एक खास समाज की भावनाएं आहत होने की बात सामने आई है। इसी मुद्दे पर अब उत्तर प्रदेश की राजनीति भी गरमा गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस फिल्म को लेकर भारतीय जनता पार्टी पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लंबा बयान जारी करते हुए कहा कि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि सोची-समझी राजनीतिक साजिश का हिस्सा है। अखिलेश यादव का कहना है कि भाजपा लंबे समय से किसी न किसी बहाने समाज के अलग-अलग वर्गों को निशाना बनाती रही है और अब फिल्मों के जरिए यह काम किया जा रहा है। उनके अनुसार, पहले बयानबाजी, फिर विज्ञापन और अब सिनेमा के माध्यम से समाज को बदनाम करने की कोशिश हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म का नाम ही इतना आपत्तिजनक है कि उसे दोहराना भी एक समाज का अपमान करने जैसा है।

BJP पर अखिलेश यादव का बड़ा आरोप

अखिलेश यादव ने अपने बयान में बीजेपी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि भाजपा हमेशा एक ही तरीका अपनाती है। पहले किसी समाज के कुछ लोगों का इस्तेमाल उसी समाज के खिलाफ किया जाता है, फिर पूरे समाज को टारगेट किया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा कभी बयान के जरिए, कभी नोटिस भेजकर और कभी पैसा लगाकर फिल्म, प्रचार सामग्री या विज्ञापन बनवाकर समाज को बदनाम करती है। सपा प्रमुख ने कहा कि जब विवाद बढ़ जाता है तो भाजपा गिरगिट की तरह रंग बदल लेती है और दिखावे के लिए कार्रवाई का नाटक करती है। अंदरखाने वही पार्टी इस बात से खुश होती है कि एक समाज को अपमानित और उत्पीड़ित किया गया। अखिलेश यादव ने साफ कहा कि यह सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है, ताकि समाज को बांटा जा सके और नफरत की राजनीति को बढ़ावा मिले।

‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ या पूर्वाग्रह से भरी सोच?

फिल्म को लेकर उठ रहे सवालों पर अखिलेश यादव ने ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ की दलील को भी खारिज किया। उन्होंने कहा कि अगर कोई रचना या फिल्म जानबूझकर किसी समाज की गरिमा और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाती है, तो उसे रचनात्मक स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता। यह रचनात्मक समझ की कमी है। उन्होंने कहा कि ऐसी फिल्मों का उद्देश्य मनोरंजन नहीं बल्कि एक खास एजेंडे को आगे बढ़ाना होता है। अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि अगर ऐसी फिल्मों से निर्माताओं को आर्थिक नुकसान होगा, तभी भविष्य में इस तरह की फिल्में बननी बंद होंगी। उनके अनुसार, पैसे के लालच में कुछ लोग भाजपा का एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्होंने मांग की कि इस फिल्म के पीछे कौन लोग हैं, कौन पैसा लगा रहा है और क्यों सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाने का काम किया जा रहा है, इसका खुलासा होना चाहिए।

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अखिलेश का साफ संदेश

अखिलेश यादव ने अपने बयान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर भी स्पष्ट रुख रखा। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी तब तक ही स्वीकार्य है, जब तक वह किसी दूसरे की गरिमा और सम्मान को ठेस न पहुंचाए। सिनेमा को समाज का दर्पण माना जाता है, लेकिन यह दर्पण साफ होना चाहिए, मैला और मलिन नहीं। उन्होंने कहा कि अगर सिनेमा समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करेगा, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अखिलेश यादव के इस बयान के बाद ‘घूसखोर पंडत’ फिल्म विवाद अब सिर्फ एक सांस्कृतिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी तरह राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार और फिल्म निर्माताओं की तरफ से इस पर क्या कदम उठाए जाते हैं।

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