संभल हिंसा से जुड़े मामले में मुल्ला अफरोज को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सामने आया है। अदालत ने अफरोज को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में रखने का आदेश रद्द कर दिया। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई गई। कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस हिरासत के दौरान सामने आए कथित कबूलनामे के आधार पर किसी व्यक्ति को NSA के तहत हिरासत में रखा जा सकता है। अदालत ने कहा कि केवल ऐसे कथित कबूलनामे के आधार पर निवारक हिरासत को सही नहीं ठहराया जा सकता। इस फैसले के बाद मुल्ला अफरोज का नाम फिर सुर्खियों में है।
कारोबार से जुड़े हैं मुल्ला अफरोज, हिंसा की जांच में आया नाम
मुल्ला अफरोज संभल के रहने वाले कारोबारी और प्रॉपर्टी डीलर हैं। उनके वकील की ओर से अदालत में पेश किए गए रिकॉर्ड में उन्हें स्थानीय कारोबारी और इनकम टैक्स देने वाला व्यक्ति बताया गया था। 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़क गई थी। इस घटना में चार लोगों की जान गई थी और पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हुए थे। इसी घटना की जांच आगे बढ़ने पर पुलिस की जांच में अफरोज का नाम सामने आया। पुलिस ने उन पर हिंसा की साजिश से जुड़े होने का आरोप लगाया था। हालांकि, ये जांच एजेंसी के आरोप हैं और अदालत में आरोप साबित होना अलग कानूनी प्रक्रिया है।
शारिक साठा से रिश्ते को लेकर पुलिस ने क्या कहा?
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने अफरोज को दुबई में रहने वाले शारिक साठा से जोड़ने का दावा किया। पुलिस के मुताबिक, दोनों के बीच संपर्क था और अफरोज कथित तौर पर साठा के स्थानीय नेटवर्क से जुड़े हुए थे। जांच में पुलिस ने यह भी दावा किया था कि पूछताछ के दौरान अफरोज ने हिंसा के पीछे साठा का नाम लिया था। यही कथित बयान बाद की कार्रवाई में भी चर्चा का विषय बना। दूसरी ओर, अफरोज की ओर से आरोपों को चुनौती दी गई और कहा गया कि उनके खिलाफ सीधे तौर पर पर्याप्त सबूत नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने अब इसी तरह के कथित कबूलनामे को अकेले NSA हिरासत का आधार मानने पर सवाल उठाया है।
पहले गिरफ्तारी, फिर जमानत और उसके बाद NSA
पुलिस ने जनवरी 2025 में अफरोज को संभल हिंसा से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया था। बाद में उन्हें नियमित जमानत मिल गई। इसके कुछ समय बाद 13 अक्टूबर 2025 को संभल के जिलाधिकारी ने उनके खिलाफ NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया। इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस कार्रवाई को चुनौती दी गई, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब शीर्ष अदालत ने NSA के तहत हिरासत को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई है। इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि निवारक हिरासत में किसी व्यक्ति के खिलाफ इस्तेमाल किए गए आधार और सबूतों की कानूनी जांच कितनी महत्वपूर्ण होती है।
