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यूपी की दलित राजनीति में नई लड़ाई! मायावती से दूरी बढ़ी तो किसके साथ जाएंगे चंद्रशेखर?

मायावती और चंद्रशेखर आजाद के बीच बढ़ती राजनीतिक दूरी के बीच यूपी में नए चुनावी समीकरणों की चर्चा तेज है। जानिए सपा और आजाद समाज पार्टी के संभावित गठबंधन का किन सीटों पर पड़ सकता है असर।

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोटों को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के बीच हाल के दिनों में बयानबाजी ने नया राजनीतिक माहौल बना दिया है। मेरठ की एक दलित छात्रा के मामले को लेकर दोनों नेताओं के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए। मायावती ने चंद्रशेखर पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वे केवल दिखावटी सहानुभूति जताते हैं। इसके जवाब में चंद्रशेखर आजाद ने भी नाराजगी जाहिर की और कहा कि अगर दलित समाज के दर्द की चिंता होती तो मौके पर पहुंचकर पीड़ित परिवार का साथ दिया जाता। इस बयानबाजी के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दलित राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

क्या सपा और आजाद समाज पार्टी साथ आ सकते हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी के बीच चुनावी समझौता होता है तो इसका असर कई सीटों पर दिखाई दे सकता है। फिलहाल दोनों दलों की ओर से किसी औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन चर्चाएं लगातार चल रही हैं। चंद्रशेखर आजाद ने पिछले कुछ वर्षों में दलित युवाओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है। वहीं समाजवादी पार्टी भी अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में अगर दोनों दल एक साथ आते हैं तो यह गठजोड़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर मुकाबले को दिलचस्प बना सकता है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह समीकरण खास तौर पर उन क्षेत्रों में असर डाल सकता है जहां दलित और पिछड़े वर्ग के वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

पश्चिमी यूपी की सीटों पर पड़ सकता है सबसे ज्यादा असर

चंद्रशेखर आजाद का प्रभाव मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में माना जाता है। नगीना, बिजनौर, सहारनपुर, मेरठ, गाजियाबाद और आगरा जैसे क्षेत्रों में उनकी सक्रियता लगातार बढ़ी है। दूसरी ओर, यही इलाके लंबे समय तक बसपा के मजबूत गढ़ माने जाते रहे हैं। यदि दलित वोटों का एक हिस्सा चंद्रशेखर के साथ जाता है और समाजवादी पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक से जुड़ता है, तो कई सीटों पर चुनावी गणित बदल सकता है। गाजियाबाद सदर, लोनी और आसपास की कुछ सीटों पर पहले भाजपा और बसपा के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलता रहा है, जबकि सपा पीछे रह जाती थी। लेकिन नए राजनीतिक समीकरण बनने पर इन सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय या और ज्यादा रोचक हो सकता है।

दलित वोटों की राजनीति में नया दौर शुरू होने के संकेत

उत्तर प्रदेश में दलित वोट हमेशा से चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। लंबे समय तक मायावती को इस वर्ग का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता रहा, लेकिन अब नई पीढ़ी के बीच चंद्रशेखर आजाद की लोकप्रियता भी बढ़ रही है। कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दलित समाज का एक वर्ग नए विकल्पों की तलाश कर रहा है। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दलित राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सपा और आजाद समाज पार्टी का गठबंधन होगा या नहीं, लेकिन दोनों नेताओं की राजनीतिक गतिविधियों पर सभी की नजर है। यदि भविष्य में कोई बड़ा राजनीतिक फैसला होता है, तो उसका असर केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे राज्य की राजनीति पर पड़ सकता है।

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