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आरोपों के साये में चंपत राय की विदाई; 28 साल की सेवा के बाद अयोध्या में एक अध्याय का अंत

अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का इस्तीफा हुआ मंजूर। चढ़ावा चोरी और जमीन खरीद में गड़बड़ी के आरोपों के बीच SIT रिपोर्ट ने खड़े किए सवाल।

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श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से एक बेहद चौंकाने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है। राम मंदिर निर्माण आंदोलन में पिछले 28 वर्षों से एक मजबूत स्तंभ रहे और करीब साढ़े छह साल तक ट्रस्ट के महासचिव पद की जिम्मेदारी संभालने वाले 79 वर्षीय चंपत राय की अयोध्या से विदाई हो गई है। ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास की अगुवाई में हुई एक हाई-लेवल बैठक में चंपत राय का इस्तीफा आखिरकार स्वीकार कर लिया गया। राम मंदिर में चढ़ावा चोरी और अयोध्या में जमीन की खरीद-फरोख्त में आई कथित अनियमितताओं के बाद इस फैसले ने देश के सियासी और धार्मिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। जो चंपत राय कभी मंदिर आंदोलन का मुख्य चेहरा हुआ करते थे, उनका इस तरह जाना हर किसी को हैरान कर रहा है।

आपातकाल की जेल से राम मंदिर के शिखर तक का सफर

उत्तर प्रदेश के बिजनौर (नगीना) के रहने वाले चंपत राय का इतिहास बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। साल 1975 में देश में लगे आपातकाल के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद उन्होंने करीब 18 महीने जेल की सलाखों के पीछे गुजारे। जेल जाने से पहले वह धामपुर के आरएसएम कॉलेज में केमिस्ट्री (रसायन विज्ञान) के प्रोफेसर थे। लेकिन जेल से छूटने के बाद उन्होंने वापस कॉलेज का रुख नहीं किया, बल्कि उनका जीवन पूरी तरह बदल गया और वह विश्व हिंदू परिषद (VHP) से जुड़ गए। साल 1991 से उन्होंने अयोध्या में संगठन का मोर्चा संभाला और साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन्हें राम मंदिर ट्रस्ट का संस्थापक महासचिव बनाया गया। उनके बारे में यह भी दावा किया जाता है कि उनका आज तक कोई व्यक्तिगत बैंक खाता भी नहीं है।

SIT की शुरुआती रिपोर्ट और वो गंभीर लापरवाही जिसने बढ़ाई मुश्किलें

इस पूरी विदाई के पीछे स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) की वह शुरुआती रिपोर्ट है, जिसने ट्रस्ट के भीतर चल रही अव्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी। SIT की प्रारंभिक जांच में तत्कालीन महासचिव चंपत राय की प्रशासनिक भूमिका को बेहद संदिग्ध माना गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे की गिनती, उसकी सुरक्षा और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था में बेहद गंभीर लापरवाहियां बरती गईं। इतना ही नहीं, जांच में यह भी सामने आया है कि मंदिर परिसर में कई ऐसे कर्मचारी काम कर रहे थे, जिनकी नियुक्ति का कोई लिखित आदेश ही नहीं था। भर्ती प्रक्रिया में नियमों को ताक पर रखने के संकेत मिलने के बाद चंपत राय के कामकाज पर बड़े सवालिया निशान खड़े हो गए।

क्या चंपत राय ने खुद की थी चोरी? जानिए जांच का असली सच

भले ही चंपत राय को इन विवादों के बाद अपना पद छोड़ना पड़ा हो, लेकिन SIT की रिपोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू भी सामने आया है। जांच टीम ने चंपत राय पर व्यक्तिगत रूप से चढ़ावा चोरी करने या सीधे तौर पर पैसे के गबन का कोई आरोप नहीं लगाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उनके खिलाफ व्यक्तिगत रूप से चोरी करने का कोई सीधा सबूत नहीं मिला है। हालांकि, मुख्य प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते, उनके नाक के नीचे इतनी बड़ी गड़बड़ियां और लापरवाही कैसे होती रहीं, इसी बात ने उनकी विदाई की पटकथा लिख दी। 28 साल के लंबे संघर्ष का ऐसा अंत इस समय अयोध्या के संतों और राम भक्तों के बीच चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है।

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