सुप्रीम कोर्ट में एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान ऐसा दृश्य सामने आया जिसने अदालत कक्ष का माहौल गंभीर कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष झारखंड से जुड़े एक तलाक मामले पर बहस चल रही थी। अदालत ने पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को प्रति माह 10,000 रुपये गुजारा-भत्ता दे। इस पर पति की ओर से पेश वकील ने कहा कि उसका मुवक्किल रोजाना केवल 325 रुपये कमाता है और इतनी रकम देना उसके लिए संभव नहीं है। वकील का तर्क था कि पति एक निजी कंपनी में कार्यरत है, उसकी आय सीमित है और वह पहले से कई पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहा है। अदालत ने इस दलील पर आश्चर्य जताया और आय के दावे की पुष्टि के लिए आवश्यक कदम उठाने की बात कही।
पीठ की टिप्पणी—“पत्नी को साथ रखिए”, पति ने जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि यदि आर्थिक स्थिति कमजोर है तो पति पत्नी को अपने साथ रखे, जिससे परिवार सामान्य जीवन जी सके। इस पर पति की ओर से कहा गया कि वैवाहिक संबंध अब सामान्य नहीं रहे हैं और पत्नी ने उसके तथा उसके माता-पिता के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई हैं। इसलिए साथ रहना संभव नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि वह संबंधित कंपनी से संपर्क कर सकती है, जहां पति काम करता है, ताकि वेतन की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके। पति के वकील ने जवाब दिया कि अदालत यदि ऐसा करती है तो यह अन्य कर्मचारियों के लिए भी पारदर्शिता का मार्ग खोल सकता है। उन्होंने यह भी दलील दी कि भरण-पोषण तय करते समय केवल अनुमान नहीं, बल्कि वास्तविक आय, वर्तमान दायित्व और देनदारियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
शादी, अलगाव और बढ़ती मांग—मामले की पृष्ठभूमि
दंपती की शादी वर्ष 2002 में हुई थी। 2003 में उन्हें बेटा और 2005 में बेटी हुई। वर्ष 2016 से दोनों अलग रह रहे हैं और बच्चे फिलहाल पिता के साथ रहते हैं। तलाक कार्यवाही के दौरान निचली अदालत ने पति को 6 लाख रुपये एकमुश्त गुजारा-भत्ता देने का निर्देश दिया था। वकील के अनुसार, यह राशि पति के पिता ने जमीन बेचकर उपलब्ध कराई थी। बाद में पत्नी ने अदालत में अतिरिक्त मांग रखते हुए 30 लाख रुपये एकमुश्त और 12,500 रुपये मासिक गुजारा-भत्ता की मांग की। पति पक्ष का कहना है कि उसकी मासिक आय लगभग 9,750 रुपये है और वह परिवार के सहयोग से गुजर-बसर कर रहा है। ऐसे में 10,000 रुपये प्रतिमाह देना उसके लिए आर्थिक रूप से असंभव है।
फैसला सुरक्षित, अब नजर सुप्रीम कोर्ट पर
सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि अदालत आय और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन कैसे स्थापित करती है। यह मामला केवल एक परिवार तक सीमित नहीं, बल्कि उन कई मामलों का प्रतिनिधित्व करता है जहां गुजारा-भत्ता तय करते समय आय, दायित्व और वैवाहिक परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाना चुनौती बन जाता है। अदालत को यह तय करना है कि पत्नी के भरण-पोषण का अधिकार सुनिश्चित करते हुए पति की वास्तविक आर्थिक क्षमता का आकलन किस तरह किया जाए। आने वाला फैसला ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश तय कर सकता है।
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