बांग्लादेश में हुए 13वें संसदीय चुनाव के नतीजों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। 299 सीटों में से 209 सीटें जीतकर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया और लंबे समय से जारी राजनीतिक अनिश्चितता पर विराम लगा दिया। इसी के साथ भारत की ओर से भी तुरंत कूटनीतिक सक्रियता देखने को मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BNP के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान को फोन कर बधाई दी।
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि उनसे तारिक रहमान से बातचीत कर खुशी हुई। उन्होंने बांग्लादेश की जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के लिए शुभकामनाएं और समर्थन भी व्यक्त किया। इस फोन कॉल को केवल औपचारिक बधाई नहीं, बल्कि आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों की नई दिशा के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री ने यह भी दोहराया कि भारत और बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंध बेहद गहरे हैं। उन्होंने कहा कि भारत शांति, प्रगति और समृद्धि के लिए बांग्लादेश के साथ निरंतर सहयोग करता रहेगा। ऐसे समय में जब बांग्लादेश राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है, यह संदेश क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
किसे कितनी सीटें? चुनावी गणित की पूरी तस्वीर
इस चुनाव में BNP ने 209 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) ने छह सीटों पर जीत दर्ज की। इसके अलावा बांग्लादेश खिलाफत मजलिस को दो सीटें मिलीं। इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश, गण अधिकार, बीजेपी, गण संघित और खिलाफत मजलिस को एक-एक सीट हासिल हुई। सात सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की।
इन नतीजों ने साफ कर दिया कि जनता ने स्थिर और निर्णायक सरकार के पक्ष में मतदान किया है। BNP की यह जीत केवल सीटों का आंकड़ा नहीं, बल्कि बीते डेढ़ साल से चल रही राजनीतिक अस्थिरता के बाद जनता के भरोसे का संकेत भी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BNP को मिला जनादेश देश में प्रशासनिक स्थिरता और आर्थिक सुधारों की उम्मीद को मजबूत करता है। हालांकि, विपक्षी दलों की मौजूदगी भी संसद में संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकती है। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि नई सरकार किन प्राथमिकताओं के साथ काम शुरू करती है।
18 महीनों की उथल-पुथल के बाद सत्ता परिवर्तन
बांग्लादेश में अगस्त 2024 में शुरू हुए छात्र आंदोलन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था। इस आंदोलन के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हुआ, जो करीब 18 महीनों तक चला। शेख हसीना ने बाद में भारत में राजनीतिक शरण ली।
इस दौरान नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस ने अंतरिम सरकार की कमान संभाली। हालांकि उनके नेतृत्व में देश को स्थिर करने की कोशिशें हुईं, लेकिन कट्टरपंथी गतिविधियों और कानून-व्यवस्था से जुड़ी घटनाओं ने सरकार को कई चुनौतियों के सामने खड़ा किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन घटनाओं की आलोचना हुई।
ऐसे माहौल में हुए चुनाव को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली के रूप में देखा जा रहा है। जनता ने मतदान के जरिए स्पष्ट संदेश दिया कि वह स्थिर और निर्णायक नेतृत्व चाहती है। तारिक रहमान के नेतृत्व में BNP की जीत ने इस राजनीतिक संक्रमण को नई दिशा दी है।
भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर क्या होगा असर?
PM Modi Calls Tarique Rahman के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत-बांग्लादेश संबंधों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा, जल बंटवारा और सीमा प्रबंधन जैसे कई अहम मुद्दे हैं। दोनों देशों के बीच सहयोग पिछले वर्षों में लगातार बढ़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नई सरकार के गठन के बाद द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने के लिए नई पहल हो सकती है। भारत के लिए बांग्लादेश रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है, वहीं बांग्लादेश के लिए भारत एक बड़ा व्यापारिक और विकास सहयोगी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने फोन पर बातचीत में दोनों देशों के लोगों की शांति और समृद्धि के लिए भारत की प्रतिबद्धता दोहराई है। इससे यह संकेत मिलता है कि राजनीतिक बदलाव के बावजूद रिश्तों में निरंतरता बनी रह सकती है। आने वाले दिनों में नई सरकार की प्राथमिकताएं और भारत के साथ उसकी नीतियां इस रिश्ते की दिशा तय करेंगी।
दक्षिण एशिया की राजनीति में यह बदलाव केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और सहयोग की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अब देखना होगा कि BNP सरकार अपने चुनावी वादों को कैसे पूरा करती है और पड़ोसी देशों के साथ किस तरह की रणनीति अपनाती है।
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