सोमवार को लोकसभा में उस समय बड़ा हंगामा खड़ा हो गया जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन के भीतर चीन से जुड़े मुद्दे पर बोलते हुए एक ऐसी किताब का हवाला दिया, जो अब तक प्रकाशित ही नहीं हुई है। राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख की एक अप्रकाशित किताब के कुछ अंशों का ज़िक्र करते हुए सरकार और रक्षा मंत्रालय पर सवाल खड़े करने की कोशिश की। जैसे ही उन्होंने उस किताब को Quote किया, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने तुरंत आपत्ति दर्ज कराई। सत्तापक्ष का कहना था कि राहुल गांधी सदन को गुमराह कर रहे हैं और एक ऐसे स्रोत का हवाला दे रहे हैं, जिसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। इसके बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई और सदन की कार्यवाही बाधित हो गई। मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सीधे संसद के नियमों और प्रक्रियाओं से जुड़ गया, जिससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या राहुल गांधी ने लोकसभा के नियमों का उल्लंघन किया है।
किताब Quote करने पर संसद का नियम क्या कहता है?
यह आम धारणा है कि संसद में किसी किताब, अख़बार, पत्रिका या पत्र को Quote करना पूरी तरह मना है, लेकिन ऐसा नहीं है। संसद के नियमों के अनुसार, किसी भी प्रकाशित सामग्री को सदन में Quote किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए एक तय प्रक्रिया होती है। लोकसभा का नियम 349 (I) साफ तौर पर कहता है कि यदि कोई सामग्री सीधे तौर पर सदन की कार्यवाही से संबंधित नहीं है, तो उसे बिना अनुमति Quote नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित सांसद को पहले नोटिस देना होता है और स्पीकर से अनुमति लेनी होती है। राज्यसभा के पूर्व महासचिव वी. के. अग्निहोत्री के अनुसार, अगर स्पीकर की अनुमति मिल जाती है, तो किताब, अख़बार या किसी दस्तावेज़ का हवाला सदन में दिया जा सकता है। संसद में पहले भी कई बार सांसदों ने किताबों और समाचार पत्रों से उद्धरण दिए हैं, लेकिन वे सभी तय नियमों और अनुमति की प्रक्रिया के तहत किए गए थे। राहुल गांधी के मामले में विवाद इसलिए बढ़ा, क्योंकि जिस किताब का उन्होंने ज़िक्र किया, वह प्रकाशित ही नहीं हुई थी और न ही उसके लिए कोई औपचारिक अनुमति ली गई थी।
राहुल गांधी का मामला क्यों माना जा रहा है अलग और गंभीर?
राहुल गांधी का मामला सामान्य उद्धरण के मामलों से इसलिए अलग माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने जिस किताब को Quote किया, वह एक अप्रकाशित किताब थी। इसका मतलब यह हुआ कि न तो वह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी और न ही उसकी सामग्री को कोई स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकता था। यही वजह है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सवाल उठाया कि राहुल गांधी जिन बातों का हवाला दे रहे हैं, उनका स्रोत क्या है और क्या वह प्रमाणित है। संसद के नियमों के मुताबिक, अगर कोई सदस्य सदन में किसी दस्तावेज़ या किताब का ज़िक्र करता है, तो उससे उस जानकारी को सत्यापित करने के लिए कहा जा सकता है। अगर वह जानकारी भ्रामक या गलत पाई जाती है, तो इसे गंभीर उल्लंघन माना जाता है। ऐसे मामलों में विषय को संसद की विशेषाधिकार समिति (Privilege Committee) के पास भेजा जा सकता है। यह समिति पूरे मामले की जांच करती है और अगर सदस्य दोषी पाया जाता है, तो उस पर कड़ी कार्रवाई हो सकती है, यहां तक कि उसकी सदस्यता पर भी खतरा आ सकता है। यही कारण है कि इस पूरे मामले को सिर्फ एक राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि संसदीय नियमों के उल्लंघन से जुड़ा गंभीर मुद्दा माना जा रहा है।
सदस्यता तक कैसे जा सकती है, क्या है पूरी प्रक्रिया?
अगर संसद के किसी सदस्य पर यह आरोप साबित होता है कि उसने जानबूझकर सदन को गुमराह किया है या नियमों का उल्लंघन किया है, तो मामला विशेषाधिकार समिति को सौंपा जाता है। यह समिति मामले की गहराई से जांच करती है, सबूत जुटाती है और संबंधित सदस्य से जवाब मांगती है। जांच के बाद समिति अपनी रिपोर्ट संसद में पेश करती है। यदि रिपोर्ट में यह पाया जाता है कि सदस्य दोषी है और उसने गंभीर उल्लंघन किया है, तो संसद उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकती है। इसमें माफी मांगने से लेकर निलंबन और यहां तक कि सदस्यता समाप्त करने जैसी कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। हालांकि, यह प्रक्रिया लंबी और कानूनी रूप से बेहद औपचारिक होती है। राहुल गांधी के मामले में फिलहाल यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या अप्रकाशित किताब को Quote करना संसदीय नियमों का उल्लंघन है और क्या इसके लिए पहले अनुमति ली गई थी। सत्तापक्ष का आरोप है कि यह सदन को गुमराह करने का प्रयास था, जबकि विपक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक बहस का हिस्सा बता रहा है। लेकिन इतना साफ है कि इस एक उद्धरण ने संसद के नियमों, अधिकारों और जिम्मेदारियों को लेकर एक बड़ी बहस खड़ी कर दी है, जो आने वाले दिनों में और भी गहराती नजर आ सकती है।
