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रात भर करती रही कॉल, नहीं आई एंबुलेंस! आदिवासी महिला ने सड़क पर दिया प्रसव, सिस्टम की खुली पोल

विदिशा जिले के पठारी क्षेत्र में 108 एंबुलेंस और जननी एक्सप्रेस समय पर नहीं पहुंचीं, जिससे आदिवासी महिला को भीषण ठंड में सड़क पर बच्चे को जन्म देना पड़ा। पढ़िए पूरी घटना और प्रशासन की कार्रवाई।

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मध्यप्रदेश के विदिशा जिले के पठारी क्षेत्र से एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। यहां छपारा गांव की रहने वाली आदिवासी महिला संध्या को गुरुवार रात करीब तीन बजे अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। घरवालों को लगा कि अब देर करना ठीक नहीं, इसलिए उन्होंने तुरंत 108 एंबुलेंस और जननी एक्सप्रेस को फोन करना शुरू किया। एक बार नहीं, कई बार कॉल किए गए, लेकिन किसी भी नंबर से मदद नहीं पहुंची। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, रात का सन्नाटा था और महिला दर्द से कराह रही थी। काफी इंतजार करने के बाद जब कोई साधन नहीं मिला, तो परिजनों ने तय किया कि पैदल ही अस्पताल जाया जाए। उन्हें उम्मीद थी कि रास्ते में कहीं न कहीं मदद मिल जाएगी, लेकिन हालात इससे भी ज्यादा खराब होने वाले थे।

ठंड में सड़क पर ही हो गया प्रसव

परिजन संध्या को सहारा देकर अस्पताल की ओर ले जा रहे थे, लेकिन रास्ते में गढ़ी मोहल्ला क्षेत्र में सरकारी राशन दुकान के सामने महिला की हालत ज्यादा बिगड़ गई। वहीं सड़क पर ही उसे तेज दर्द उठने लगा और प्रसव शुरू हो गया। खुले आसमान के नीचे, सर्द हवा और ठिठुरन के बीच महिला को सड़क पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ा। परिवार वालों ने ठंड से बचाने के लिए प्लास्टिक की तिरपाल ओढ़ा दी, लेकिन हालात बेहद मुश्किल थे। बच्चे की नाल जुड़ी होने के कारण संध्या को काफी देर तक सड़क पर ही लेटे रहना पड़ा। आसपास खड़े लोग यह दृश्य देखकर सहम गए। यह वही समय था, जब सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की असली हालत सबके सामने आ गई। जिस जननी एक्सप्रेस को गर्भवती महिलाओं के लिए जीवन रेखा कहा जाता है, वह इस वक्त पूरी तरह गायब थी।

आम लोगों ने दिखाई इंसानियत

जहां सरकारी मदद नहीं पहुंची, वहीं आम लोगों और स्थानीय कर्मचारियों ने इंसानियत दिखाई। घटना की जानकारी मिलते ही पठारी की महिला चौकीदार हरी बाई मौके पर पहुंचीं। उन्होंने तुरंत स्थानीय दाई राज बाई को बुलाया और दोनों ने मिलकर सुरक्षित प्रसव कराया। ठंड से बचाव के लिए आसपास मौजूद लोगों ने आग जलाई। रवि पंथी, मुकेश पंथी और संजय जैन ने भी बिना देर किए हर संभव मदद की। डिलीवरी के बाद सबसे बड़ी चिंता मां और नवजात को अस्पताल पहुंचाने की थी। ऐसे में संजय जैन अपनी मारुति वैन लेकर आए और दोनों को अस्पताल तक पहुंचाया। अगर उस रात ये लोग मदद के लिए आगे नहीं आते, तो बड़ा हादसा भी हो सकता था। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कई बार सिस्टम से पहले इंसानियत काम आती है।

जांच के आदेश, लेकिन सवाल अब भी बाकी

घटना सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने मामले को गंभीरता से लिया। शुक्रवार दोपहर सीएमएचओ डॉ. रामहित कुमार पठारी पहुंचे और पीड़ित परिवार से बात की। उन्होंने बताया कि 108 एंबुलेंस और जननी एक्सप्रेस के कॉल रिकॉर्ड की जांच की जा रही है। अगर किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी। वहीं संध्या के पति संजय आदिवासी ने साफ कहा कि अगर समय पर एंबुलेंस आ जाती, तो उनकी पत्नी को सड़क पर इतना दर्द नहीं सहना पड़ता। फिलहाल मां और नवजात दोनों सुरक्षित हैं, लेकिन यह घटना ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर स्थिति को उजागर करती है। अब सवाल यह है कि क्या जांच के बाद सिर्फ कार्रवाई होगी या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम भी उठाए जाएंगे।

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