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जब एक विदेशी पत्रकार भारत का हो गया: 90 साल की उम्र में सर मार्क टली का दिल्ली में निधन

बीबीसी के पूर्व ब्यूरो चीफ और वरिष्ठ पत्रकार सर मार्क टली का 90 वर्ष की उम्र में दिल्ली में निधन हो गया। रेडियो के दौर से लेकर इमरजेंसी, इंदिरा गांधी, अयोध्या और भुट्टो मुकदमे तक, पढ़िए उनकी पूरी पत्रकारिता यात्रा।

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बीबीसी के पूर्व ब्यूरो चीफ और वरिष्ठ पत्रकार सर मार्क टली का रविवार, 25 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। लंबे समय से भारत में रह रहे मार्क टली ने दिल्ली में ही अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि बीबीसी से जुड़े उनके पुराने साथी पत्रकार सतीश जैकब ने की। मार्क टली उस समय भारत आए थे, जब यहां टेलीविजन आम नहीं था और रेडियो पर सिर्फ सरकारी खबरें चलती थीं। ऐसे दौर में उन्होंने बीबीसी रेडियो के जरिए भारत की असली तस्वीर दुनिया तक पहुंचाई। उन्होंने पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के मुकदमे, इंदिरा गांधी की हत्या, आपातकाल और कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों को बहुत करीब से कवर किया। वे हमेशा कहते थे कि पत्रकारिता में नाम होना बड़ी बात नहीं, बड़ी बात सच्चाई को ईमानदारी से दिखाना है। उनका मानना था कि घमंड पत्रकारिता के लिए सबसे खतरनाक चीज है। बीबीसी से रिटायर होने के बाद भी वे लिखते और बोलते रहे और भारत से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय खुलकर रखते रहे।

कलकत्ता में जन्म, लेकिन दिल से भारतीय बने मार्क टली

मार्क टली का जन्म कलकत्ता (अब कोलकाता) के टॉलीगंज इलाके में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई दार्जिलिंग में हुई। इसके बाद वे पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इतिहास और धर्मशास्त्र में मास्टर्स किया। पढ़ाई के बाद उन्होंने कुछ समय सेना में काम किया और फिर एक सामाजिक संस्था से जुड़ गए। शुरू में वे पत्रकार नहीं, बल्कि पादरी बनना चाहते थे और बुजुर्गों की सेवा करने वाली संस्था में चार साल तक काम भी किया। बाद में उन्होंने बीबीसी में नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन उन्हें पत्रकार नहीं बल्कि पर्सनल डिपार्टमेंट में क्लर्क की नौकरी मिली। भारत लौटने के बाद भी उन्हें यही काम दिया गया। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी। वे खाली समय में टीवी टीम की मदद करते और रिपोर्टिंग सीखते रहे। उनकी पहली रिपोर्ट स्टेट्समैन विंटेज कार रैली पर थी, जिसे काफी पसंद किया गया। इसके बाद धीरे-धीरे वे एक भरोसेमंद पत्रकार बन गए। 1964 में उन्होंने बीबीसी में पूरी तरह पत्रकारिता शुरू की और 1972 से 1994 तक बीबीसी के दिल्ली संवाददाता रहे।

हिंदी से प्यार और आपातकाल का कठिन दौर

मार्क टली को हिंदी भाषा से खास लगाव था। हालांकि बचपन में उन्हें हिंदी और बंगाली सीखने से रोका गया था। उन्होंने खुद बताया था कि जब वे हिंदी बोलते थे तो आया ने उन्हें थप्पड़ तक मार दिया था। इसके बावजूद भारत आने के बाद उन्होंने हिंदी अखबार पढ़कर और लोगों से बात करके हिंदी सीखी। वे अक्सर कहते थे कि जब वे किसी से हिंदी में बात करते हैं और सामने वाला अंग्रेजी में जवाब देता है, तो उन्हें दुख होता है। आपातकाल के दौरान उनकी रिपोर्टिंग सरकार को पसंद नहीं आई। उस समय के सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने उनसे पूछ लिया था कि उन्हें खबरें कौन देता है और यहां तक कह दिया था कि अगर वे जासूस नहीं हैं तो हिंदी क्यों सीख रहे हैं। मार्क टली ने संजय गांधी को सख्त सोच वाला नेता बताया था, जबकि इंदिरा गांधी के बारे में कहा था कि वे कभी बहुत अपनापन दिखाती थीं और कभी काफी सख्त हो जाती थीं। उन्होंने यह भी बताया था कि इमरजेंसी के समय बीबीसी की कई खबरों को सरकार ने अफवाह बताया, लेकिन वे हमेशा सच दिखाने पर डटे रहे।

अयोध्या की रिपोर्टिंग से किताबों तक, एक यादगार सफर

मार्क टली अयोध्या की घटना के समय भी वहां मौजूद थे। उन्होंने बताया था कि उस समय हालात बहुत खराब थे और वहां से खबर भेजना मुश्किल हो गया था। वे फैजाबाद जाकर किसी तरह स्टोरी भेज पाए। बीबीसी ने सबसे पहले अयोध्या में हुई तोड़फोड़ की खबर दुनिया को दी थी। इसके बाद उन्हें और उनके साथ मौजूद भारतीय पत्रकारों को भीड़ के गुस्से का सामना करना पड़ा। पत्रकारिता के साथ-साथ मार्क टली ने कई किताबें भी लिखीं, जिनमें नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया, इंडियाज़ अनएंडिंग जर्नी और नॉन-स्टॉप इंडिया काफी चर्चित रहीं। उनके योगदान को देखते हुए ब्रिटेन ने उन्हें 2002 में नाइटहुड की उपाधि दी और भारत सरकार ने 2005 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। एक विदेशी होकर भी उन्होंने भारत को अपना घर माना। उनका निधन पत्रकारिता के उस दौर की विदाई है, जब खबरें जमीन से जुड़ी और ईमानदार हुआ करती थीं।

 

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