Monday, February 2, 2026
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1 जनवरी को न तो मुसलमान न तो हिंदुओं का नया साल… न्यू ईयर सेलिब्रेशन पर मौलाना ने दी चेतावनी

बरेली के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने नए साल के जश्न को इस्लाम में नाजायज़ बताया. 31 दिसंबर की पार्टियों, नाच-गाने और फिजूलखर्ची पर कड़ा विरोध जताया.

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नए साल 2026 के स्वागत से ठीक पहले उत्तर प्रदेश के बरेली से एक बड़ा और चर्चा में रहने वाला बयान सामने आया है. ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष और बरेलवी विचारधारा के प्रमुख इस्लामिक धर्मगुरु मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने 31 दिसंबर की रात मनाए जाने वाले नए साल के जश्न को इस्लाम में नाजायज़ करार देते हुए इस पर फतवा जारी किया है. उन्होंने साफ कहा कि नए साल के नाम पर होने वाली पार्टियां, नाच-गाना, शोर-शराबा, दिखावा और फिजूलखर्ची इस्लामिक शरीयत के खिलाफ हैं. मौलाना रजवी के मुताबिक, यह चलन पश्चिमी संस्कृति से आया है, जिसका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने मुस्लिम समाज से अपील की कि वे 31 दिसंबर की रात ऐसे आयोजनों से दूरी बनाएं और धर्म की मूल शिक्षाओं का पालन करें. उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब देशभर में नए साल के जश्न की तैयारियां जोरों पर हैं और होटल, क्लब व रिसॉर्ट्स में पार्टियों की बुकिंग चल रही है.

‘इस्लाम में जनवरी नहीं, मुहर्रम से शुरू होता है नया साल’

मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने न्यूज एजेंसी से बातचीत में कहा कि इस्लाम में नए साल की शुरुआत जनवरी से नहीं, बल्कि मुहर्रम के महीने से होती है. उनके अनुसार, 1 जनवरी को नया साल मानना इस्लामिक परंपराओं के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि 31 दिसंबर की रात को लोग जिस तरह से डांस, म्यूजिक, शराब, फूहड़ हरकतों और बेवजह खर्च में लिप्त रहते हैं, वह न सिर्फ इस्लाम बल्कि नैतिक मूल्यों के भी खिलाफ है. मौलाना रजवी ने इसे ‘बेकार और गैर-जरूरी’ गतिविधि बताते हुए कहा कि मुसलमानों को ऐसे आयोजनों से खुद को अलग रखना चाहिए. उनका कहना है कि नए साल का यह जश्न मूल रूप से ईसाई समुदाय से जुड़ा हुआ है और मुस्लिम समाज को इसकी नकल करने की जरूरत नहीं है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि धर्म इंसान को संयम, सादगी और आत्मसंयम सिखाता है, जबकि नए साल की पार्टियां अक्सर इसके उलट संदेश देती हैं.

‘1 जनवरी न इस्लाम का नया साल, न हिंदू धर्म का’

मौलाना रजवी ने अपने बयान में सिर्फ इस्लाम ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में भी नया साल जनवरी से नहीं, बल्कि चैत्र महीने से शुरू होता है. ऐसे में 1 जनवरी को नया साल मानना किसी भी भारतीय धर्म की मूल परंपरा से मेल नहीं खाता. उन्होंने पश्चिमी संस्कृति की अंधी नकल पर सवाल उठाते हुए कहा कि हर धर्म और समाज की अपनी पहचान और परंपराएं होती हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना सही नहीं है. मौलाना के मुताबिक, नए साल के नाम पर होने वाली पार्टियां समाज में अश्लीलता, दिखावा और फिजूलखर्ची को बढ़ावा देती हैं. उन्होंने कहा कि युवा वर्ग को खास तौर पर सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि इस तरह के आयोजनों में अक्सर ऐसे काम हो जाते हैं, जो बाद में पछतावे का कारण बनते हैं. उनका मानना है कि नया साल आत्ममंथन, अच्छे संकल्प और समाज के लिए कुछ सकारात्मक करने का अवसर होना चाहिए, न कि शोर-शराबे और दिखावे का.

पार्टी करने वालों को चेतावनी, विरोध का ऐलान

मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई युवक या युवती नए साल के नाम पर पार्टी का आयोजन करता है और उसमें नाच-गाना, गाना-बजाना या फूहड़ गतिविधियां होती हैं, तो इस्लामिक विद्वान ऐसे आयोजनों का सख्त विरोध करेंगे. उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर समझौता नहीं किया जा सकता. मौलाना ने लोगों से अपील की कि वे अपना समय इबादत, अच्छे कामों और समाज के हित में लगाएं. उन्होंने फिजूलखर्ची को इस्लाम में गुनाह बताते हुए कहा कि गरीबों की मदद, जरूरतमंदों का ख्याल और इंसानियत की सेवा ही असली खुशी देती है. मौलाना रजवी का यह बयान सोशल मीडिया और धार्मिक हलकों में तेजी से चर्चा का विषय बन गया है. जहां एक ओर कुछ लोग उनके विचारों का समर्थन कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग इसे व्यक्तिगत आस्था का मामला बता रहे हैं. हालांकि इतना तय है कि नए साल से पहले यह फतवा धार्मिक और सामाजिक बहस को और तेज करने वाला है.

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