हरियाणा के अंबाला से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जिसने बाप-बेटों के रिश्ते पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोमवार देर रात अंबाला के एक हाईवे किनारे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति ठंड में कांपता और बेहद दयनीय हालत में पड़ा मिला। राहगीरों और डायल 112 को जब इसकी सूचना मिली, तो मौके पर पहुंची पुलिस टीम भी कुछ पल के लिए सन्न रह गई। बुज़ुर्ग की हालत इतनी खराब थी कि वह ठीक से उठ भी नहीं पा रहा था। उसके पैरों में गंभीर इन्फेक्शन था और शरीर ठंड से जकड़ा हुआ था। पूछने पर उसने अपना नाम इंद्रजीत बताया और बताया कि वह अंबाला का ही रहने वाला है। इस दृश्य ने वहां मौजूद हर शख्स को अंदर तक झकझोर दिया, क्योंकि इतनी सर्द रात में किसी बुज़ुर्ग को यूं बेसहारा छोड़ देना किसी अपराध से कम नहीं था।
बीमारी बनी बोझ, तीन बेटों ने पिता को घर से निकाला
नागरिक अस्पताल पहुंचने के बाद जब इंद्रजीत की हालत कुछ स्थिर हुई, तब जो सच्चाई सामने आई, उसने रिश्तों की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। इंद्रजीत ने बताया कि उनके पैर में लंबे समय से इन्फेक्शन था, जिसकी वजह से वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गए थे। बीमारी के कारण वह अपने तीन बेटों पर निर्भर हो गए थे, लेकिन यही निर्भरता उनके लिए “बोझ” बन गई। आरोप है कि तीनों बेटों ने इलाज कराने के बजाय उन्हें घर से निकाल दिया और देर रात हाईवे किनारे छोड़ आए। ठंड, अंधेरा और बीमारी—तीनों से जूझते हुए इंद्रजीत पूरी रात मौत से लड़ते रहे। यह कहानी सिर्फ एक बुज़ुर्ग की पीड़ा नहीं, बल्कि उस सामाजिक सोच का आईना है जहां बुज़ुर्ग माता-पिता को जिम्मेदारी नहीं, समस्या समझा जाने लगा है।
डायल 112 और वंदे मातरम् दल ने दिखाई इंसानियत
इस अमानवीय घटना के बीच इंसानियत की एक किरण भी देखने को मिली। हाईवे पर गश्त कर रही डायल 112 की टीम ने जब बुज़ुर्ग को देखा, तो तुरंत वंदे मातरम् दल से संपर्क किया। सूचना मिलते ही वंदे मातरम् दल की टीम मौके पर पहुंची और बिना समय गंवाए इंद्रजीत को नागरिक अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में उनका प्राथमिक इलाज शुरू किया गया और ठंड से बचाने के लिए जरूरी इंतजाम किए गए। वंदे मातरम् दल के सदस्यों ने बताया कि अगर कुछ घंटे और देरी हो जाती, तो बुज़ुर्ग की जान को गंभीर खतरा हो सकता था। इस रेस्क्यू ने यह साबित किया कि समाज में अभी भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो बिना किसी स्वार्थ के मानवता निभाने को तैयार हैं, भले ही रिश्ते अपने ही क्यों न टूट जाएं।
बेटों की तलाश में जुटी टीम, समाज के लिए बड़ा सवाल
फिलहाल वंदे मातरम् दल और स्थानीय प्रशासन इंद्रजीत के तीनों बेटों की पहचान और तलाश में जुटा हुआ है। यह भी जांच की जा रही है कि क्या इस मामले में बुज़ुर्गों के उत्पीड़न से जुड़े कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह घटना सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच पर तमाचा है। जिस पिता ने अपने बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया, वही पिता बीमारी में अकेला छोड़ दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं बढ़ती पारिवारिक संवेदनहीनता का संकेत हैं, जहां बुज़ुर्गों की जिम्मेदारी से लोग बचना चाहते हैं। इंद्रजीत का इलाज अभी जारी है, लेकिन उनके मन का दर्द शायद उम्र भर नहीं मिट पाएगा। यह घटना समाज से एक ही सवाल पूछती है—क्या रिश्ते अब सिर्फ सुविधा तक सीमित रह गए हैं?
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