कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) योजना की वर्तमान स्थिति को लेकर केंद्र सरकार पर बड़ा हमला बोला है। सोनिया गांधी ने एक कड़े लेख और बयानों के माध्यम से आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार जानबूझकर इस ऐतिहासिक योजना को कमजोर कर रही है। उन्होंने ‘बुलडोजर’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि जिस तरह सरकार ने मनरेगा के बजट और क्रियान्वयन पर मनमानी की है, वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ को तोड़ने जैसा है। सोनिया गांधी के अनुसार, यह योजना करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए संकट के समय एक सुरक्षा कवच का काम करती रही है, लेकिन अब सरकार की नीतियों के कारण इस कवच में छेद किए जा रहे हैं।
बजट में कटौती और योजना को खत्म करने की साजिश
सोनिया गांधी ने अपने संबोधन में सबसे प्रमुख मुद्दा मनरेगा के बजट में की जा रही लगातार कटौती को बनाया है। उन्होंने तर्क दिया कि जब ग्रामीण क्षेत्रों में काम की मांग बढ़ रही है, तब सरकार ने बजट आवंटन को न्यूनतम स्तर पर ला दिया है। उन्होंने कहा कि फंड की कमी के कारण राज्यों को समय पर पैसा नहीं मिल रहा है, जिससे मजदूरों के वेतन में महीनों की देरी हो रही है। सोनिया गांधी ने इसे सरकार की एक सोची-समझी ‘साजिश’ करार दिया, जिसके तहत योजना को इतना फंड-विहीन कर दिया जाए कि वह धीरे-धीरे खुद ही दम तोड़ दे। उनके अनुसार, मनरेगा केवल एक रोजगार योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत का कानूनी अधिकार है जिसे छीनने की कोशिश की जा रही है।
डिजिटल बाधाएं और आधार आधारित भुगतान का विवाद
सरकार द्वारा लागू किए गए नए डिजिटल नियमों, जैसे कि ‘नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम’ (NMMS) और अनिवार्य ‘आधार आधारित भुगतान प्रणाली’ पर भी सोनिया गांधी ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में जहां इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल साक्षरता की भारी कमी है, वहां इस तरह के नियम केवल मजदूरों को काम से वंचित करने का बहाना हैं। कई मजदूर केवल इसलिए अपना वेतन नहीं पा पा रहे हैं क्योंकि उनका आधार तकनीकी रूप से लिंक नहीं है या उनकी डिजिटल उपस्थिति दर्ज नहीं हो पाई। सोनिया गांधी का मानना है कि इन तकनीकी बाधाओं को जानबूझकर खड़ा किया गया है ताकि पारदर्शी होने के नाम पर गरीबों को उनके जायज हक से दूर रखा जा सके।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा विनाशकारी असर
सोनिया गांधी ने चेतावनी दी कि यदि मनरेगा को इसी तरह नजरअंदाज किया गया, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। उन्होंने याद दिलाया कि कोरोना काल और आर्थिक मंदी के समय इसी योजना ने करोड़ों लोगों को भुखमरी से बचाया था। जब शहरों से पलायन हुआ, तब मनरेगा ही एकमात्र सहारा बना था। उन्होंने सरकार से मांग की है कि वह राजनीति से ऊपर उठकर इस जनहितैषी योजना को मजबूती प्रदान करे। उनके अनुसार, मनरेगा को ‘बुलडोजर’ से कुचलने के बजाय, सरकार को इसमें सुधार करने और समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की दिशा में काम करना चाहिए, ताकि देश के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन मिल सके।
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