सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें पश्चिम बंगाल के सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस से जुड़े नेता मदन मित्रा भगवान श्रीराम को लेकर विवादित टिप्पणी करते नजर आ रहे हैं। वीडियो में TMC नेता मदन मित्रा कथित तौर पर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि “राम मुस्लिम थे।” जैसे ही यह वीडियो सामने आया, कुछ ही घंटों में यह अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैल गया। वीडियो के वायरल होते ही मामला सिर्फ राजनीतिक नहीं रहा, बल्कि धार्मिक और सामाजिक बहस में भी बदल गया।
सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा, तीखी प्रतिक्रियाएं
TMC नेता मदन मित्रा के वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स की प्रतिक्रियाएं बेहद आक्रामक रहीं। कई लोगों ने इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अपमान बताया। ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर यूजर्स ने नाराजगी जताते हुए लिखा कि इस तरह के बयान जानबूझकर समाज को बांटने के लिए दिए जाते हैं। कुछ यूजर्स ने तो यहां तक कहा कि ऐसे बयान देने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, जबकि कई लोगों ने सरकार और प्रशासन से तुरंत संज्ञान लेने की मांग की।
राजनीतिक गलियारों में भी गरमाया मामला
इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद राजनीतिक हलकों में भी हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी के नेताओं द्वारा लगातार इस तरह के बयान दिए जा रहे हैं, जो सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाते हैं। वहीं, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल में इस तरह के बयान जानबूझकर सुर्खियों में बने रहने के लिए दिए जाते हैं, ताकि भावनात्मक मुद्दों पर लोगों को प्रभावित किया जा सके।
TMC नेता मदन मित्रा द्वारा भगवान श्रीराम को ‘मुसलमान’ बताया जाना केवल एक गैर-जिम्मेदार बयान नहीं, बल्कि हिंदू देवी-देवताओं और हिंदुओं की आस्था का अपमान है।
TMC की राजनीति अब इस हद तक गिर चुकी है कि वोट बैंक के लिए वह आस्था और विश्वास को भी निशाना बनाने से नहीं हिचकती। यह… pic.twitter.com/ZlrcWteY6G
— BJP (@BJP4India) December 19, 2025
धार्मिक भावनाएं और जिम्मेदार बयान की जरूरत
TMC नेता मदन मित्रा के इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं को अपने बयानों को लेकर कितनी सावधानी बरतनी चाहिए। धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों पर की गई कोई भी टिप्पणी सीधे तौर पर लोगों की भावनाओं को प्रभावित करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि नेताओं को बोलने की आज़ादी के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी समझनी चाहिए, ताकि किसी भी समुदाय की भावनाएं आहत न हों और समाज में तनाव की स्थिति पैदा न हो।
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