उत्तर प्रदेश में वर्ष 2026 में होने वाले पंचायत चुनाव से पहले राज्य निर्वाचन आयोग ने बड़ा और सख्त कदम उठाया है। आयोग ने चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए उम्मीदवारों के चुनावी खर्च की अधिकतम सीमा तय कर दी है। इस फैसले के बाद गांव-देहात की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और संभावित प्रत्याशी अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने को मजबूर हो गए हैं। आयोग का मानना है कि पिछले पंचायत चुनावों में धनबल के अत्यधिक इस्तेमाल की कई शिकायतें सामने आई थीं, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठे थे। इसी अनुभव के आधार पर इस बार आयोग ने चुनाव की घोषणा से पहले ही खर्च सीमा और उससे जुड़े नियमों को स्पष्ट कर दिया है, ताकि बाद में किसी तरह की गड़बड़ी या विवाद की गुंजाइश न रहे। पंचायत चुनाव को ग्रामीण लोकतंत्र की नींव बताते हुए आयोग ने साफ किया है कि इस बार नियमों का सख्ती से पालन कराया जाएगा और किसी भी स्तर पर ढिलाई नहीं बरती जाएगी।
पद के हिसाब से तय हुई खर्च की सीमा, हर प्रत्याशी पर रहेगी नजर
राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी गाइडलाइन के अनुसार पंचायत चुनाव में अलग-अलग पदों के लिए खर्च की अलग-अलग अधिकतम सीमा तय की गई है। ग्राम पंचायत सदस्य के लिए यह सीमा ₹10,000 रखी गई है, जबकि ग्राम प्रधान पद के प्रत्याशी अधिकतम ₹1,25,000 तक ही खर्च कर सकेंगे। इसी तरह क्षेत्र पंचायत सदस्य के लिए ₹1,00,000, जिला पंचायत सदस्य के लिए ₹2,50,000, क्षेत्र पंचायत प्रमुख (ब्लॉक प्रमुख) के लिए ₹3,50,000 और जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए अधिकतम ₹7,00,000 की सीमा तय की गई है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह राशि कुल अधिकतम सीमा है और इससे एक रुपया भी अधिक खर्च करना चुनाव नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। आयोग की ओर से गठित निगरानी टीमें चुनाव प्रचार के दौरान प्रत्याशियों की गतिविधियों पर नजर रखेंगी। पोस्टर, बैनर, वाहन, लाउडस्पीकर, जनसभाएं और सोशल मीडिया प्रचार तक के खर्च का आकलन किया जाएगा, ताकि तय सीमा का पालन सुनिश्चित हो सके।
नामांकन से लेकर प्रचार तक सख्त नियम, खर्च का पूरा हिसाब जरूरी
पंचायत चुनाव 2026 में नामांकन प्रक्रिया को भी नियमों के दायरे में रखा गया है। आयोग ने नामांकन शुल्क और जमानत राशि को स्पष्ट करते हुए यह भी बताया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिला उम्मीदवारों को नियमानुसार छूट दी जाएगी। इसके साथ ही हर प्रत्याशी को अपने चुनावी खर्च का पूरा लेखा-जोखा रखना अनिवार्य होगा। प्रचार सामग्री, वाहन उपयोग, कार्यकर्ताओं पर होने वाला खर्च, डिजिटल प्रचार और जनसभाओं पर हुए व्यय का विवरण समय-समय पर संबंधित निर्वाचन अधिकारियों को देना होगा। अगर जांच के दौरान किसी भी तरह की गड़बड़ी या खर्च छिपाने की कोशिश सामने आती है, तो प्रत्याशी पर जुर्माना लगाया जा सकता है। गंभीर मामलों में नामांकन रद्द करने या भविष्य में चुनाव लड़ने पर रोक लगाने जैसी सख्त कार्रवाई का भी प्रावधान रखा गया है। आयोग ने स्पष्ट संकेत दिया है कि इस बार “पहले जैसा चलता था” वाली सोच काम नहीं आएगी।
ग्रामीण राजनीति पर क्या पड़ेगा असर, कब हो सकते हैं चुनाव
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि खर्च सीमा तय होने से पंचायत चुनाव में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अब पैसे के दम पर चुनाव लड़ने वालों के लिए राह आसान नहीं होगी और साधारण, पढ़े-लिखे व नए चेहरे भी मजबूती से चुनाव मैदान में उतर सकेंगे। इससे गांवों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ने और वास्तविक जनप्रतिनिधि चुनकर आने की उम्मीद की जा रही है। जहां तक चुनाव की तारीखों का सवाल है, फिलहाल राज्य निर्वाचन आयोग ने आधिकारिक कार्यक्रम जारी नहीं किया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार 2026 के मध्य, यानी अप्रैल से जुलाई के बीच पंचायत चुनाव कराए जा सकते हैं। आयोग ने संभावित उम्मीदवारों से अपील की है कि वे अभी से नियमों को समझ लें, खर्च की योजना उसी हिसाब से बनाएं और किसी भी तरह के उल्लंघन से बचें। आयोग का साफ संदेश है कि पंचायत चुनाव 2026 पूरी पारदर्शिता, सख्ती और बराबरी के आधार पर कराए जाएंगे।
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