महाराष्ट्र निकाय चुनावों के बीच मालवण में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के दौरे से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में कथित तौर पर दिख रहा है कि शिंदे के काफिले में उनके सुरक्षा कर्मी कैमरे से बचते हुए एक बैग लेकर भागते नजर आ रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि इस बैग में बड़ी मात्रा में नकद रकम थी। जैसे ही वीडियो सामने आया, राजनीतिक हलचल तेज हो गई और स्थानीय स्तर पर इसकी चर्चा हर जगह होने लगी। हालांकि वीडियो की सत्यता पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, फिर भी यह मामला चुनावी माहौल को अचानक गर्म कर गया है।
वैभव नाइक ने पैसा बांटने का लगाया दावा
पूर्व विधायक वैभव नाइक ने वीडियो सामने आते ही बड़ा आरोप लगाया कि बैग में रखा पैसा बाद में इलाके के मतदाताओं में बांटा गया। उनका कहना है कि शिंदे–शिवसेना हर चुनाव में “पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा” की नीति अपनाती है। नाइक ने दावा किया कि वीडियो में दिख रहे बैग में ही वह रकम थी जिसे अगले ही दिन निलेश राणे द्वारा क्षेत्र में बांटा गया। उन्होंने कहा कि सत्ता में रहते हुए भ्रष्टाचार के जरिए जनता का पैसा इकट्ठा किया गया और वही रकम अब वोट खरीदने में उपयोग की जा रही है। नाइक का आरोप है कि यह लोकतंत्र के खिलाफ सीधा हमला है।
शिंदे गुट पर बढ़ा दबाव
वीडियो वायरल होने के बाद शिंदे गुट पर दबाव बढ़ गया है। विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है और मामले की जांच की मांग कर रहा है। विपक्ष का कहना है कि अगर सरकार सच में पारदर्शी है तो उसे इस वीडियो की जांच करवानी चाहिए। वहीं, स्थानीय लोग भी इस मुद्दे पर बंट रहे हैं—कुछ इसे राजनीतिक साजिश बता रहे हैं तो कुछ इसे बेहद गंभीर मामला मान रहे हैं। चुनाव के दौरान अवैध धन के उपयोग की चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस बार वीडियो सामने आने से मामला और संवेदनशील बन गया है।
जांच की मांग तेज, प्रशासन पर निगाहें
मालवण के मतदाताओं का कहना है कि वे निष्पक्ष चुनाव चाहते हैं और ऐसे आरोपों की पूरी जांच जरूरी है। कई नागरिकों ने प्रशासन से अपील की है कि चाहे वीडियो फर्जी हो या असली, इसकी सच्चाई सामने आनी चाहिए। राजनीतिक जानकारों का भी मानना है कि इस विवाद का असर निकाय चुनावों पर सीधा पड़ सकता है। अगर आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है, और यदि गलत साबित होते हैं, तो विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठेंगे। फिलहाल, सभी की नजरें निर्वाचन आयोग और स्थानीय प्रशासन पर टिकी हैं कि आगे क्या कार्रवाई होती है।
